S&P Global Ratings का अनुमान है कि इस साल मॉनसून कमजोर रह सकता है, जिससे भारत की महंगाई दर FY27 में बढ़कर **5.1%** तक पहुंच सकती है। इससे ग्रामीण मांग पर असर पड़ सकता है और सरकारी खर्च पर दबाव बढ़ सकता है।
मॉनसून पर S&P की चिंता
S&P Global Ratings की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल मॉनसून सामान्य से कम रहने की आशंका है। अनुमान है कि बारिश सामान्य औसत का करीब 90% ही रहेगी। अल नीनो (El Nino) की वजह से मौसम में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। यह भारत की इकोनॉमी के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकती है, जिसका सीधा असर लोगों की खर्च करने की क्षमता और कंपनियों के मुनाफे पर पड़ेगा।
महंगाई का बढ़ता खतरा और RBI
रिपोर्ट में कहा गया है कि बारिश की कमी अक्सर खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ा देती है, जो भारत के कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) का एक बड़ा हिस्सा है। S&P का अनुमान है कि इससे वित्तीय वर्ष 2027 तक महंगाई दर बढ़कर 5.1% हो सकती है, जो मई 2026 में 3.9% थी। अगर ऐसा होता है, तो रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के लिए ब्याज दरें घटाना मुश्किल हो जाएगा और उन्हें अपनी मॉनेटरी पॉलिसी को सख्त रखना पड़ सकता है। ऊंची ब्याज दरें बिजनेस और आम लोगों के लिए कर्ज लेना महंगा कर देती हैं, जिससे इकोनॉमिक ग्रोथ धीमी हो सकती है।
ग्रामीण मांग और सरकारी खर्च पर असर
ग्रामीण भारत की खपत कई भारतीय उद्योगों के लिए बहुत अहम है। अगर बारिश कम होती है, तो ग्रामीण मांग कमजोर पड़ सकती है। ऐसे में सरकार को फर्टिलाइजर सब्सिडी और मनरेगा (MGNREGA) जैसी कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च बढ़ाना पड़ सकता है। इससे भले ही ग्रामीण रोजगार को सहारा मिले, लेकिन सरकार के फिस्कल डेफिसिट (राजकोषीय घाटा) को कम करने के प्रयासों पर दबाव बढ़ेगा। हालांकि, भारत के पास अनाज का अच्छा खासा भंडार है और अर्थव्यवस्था आज पहले से ज्यादा विविध है, जिसमें सर्विस और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का योगदान बढ़ा है, जो कृषि क्षेत्र में किसी भी बड़ी गिरावट के खिलाफ एक सुरक्षा कवच का काम कर सकते हैं।
सेक्टरों पर असर और बैंकिंग की स्थिरता
कुछ इंडस्ट्रीज मौसम के झटकों के प्रति दूसरों की तुलना में ज्यादा संवेदनशील होती हैं। ऐतिहासिक तौर पर, कमजोर मॉनसून के दौरान ट्रैक्टर और एग्रोकेमिकल सेक्टरों में बिक्री में करीब 10% की गिरावट देखी गई है। टू-व्हीलर बनाने वाली कंपनियों की बिक्री में 5% से 10% तक की कमी आ सकती है, जबकि FMCG कंपनियों को 2% से 5% तक का नुकसान झेलना पड़ सकता है। इसके अलावा, बिजली की कुल सप्लाई स्थिर रहने की उम्मीद है, लेकिन कुछ इलाकों में हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर जेनरेशन में 10% से 15% तक की गिरावट आ सकती है।
फाइनेंशियल सेक्टर की बात करें तो बैंकों से इन दबावों को झेलने की उम्मीद है। हालांकि, ग्रामीण इलाकों में कर्ज की मांग में कमी और एग्रीकल्चर से जुड़े लोन की एसेट क्वालिटी में हल्की नरमी का जोखिम है। माइक्रोफाइनेंस इंस्टीट्यूशंस (MFIs) पर इसका ज्यादा असर पड़ सकता है क्योंकि वे ग्रामीण और कृषि से जुड़ी आय पर निर्भर करते हैं। इन जोखिमों के बावजूद, बेहतर सिंचाई व्यवस्था, फसल बीमा का विस्तार और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में बढ़ोतरी से बड़े पैमाने पर कर्ज के तनाव को सीमित करने की उम्मीद है। निवेशक आने वाली तिमाहियों में कॉर्पोरेट मुनाफे पर असल असर का आकलन करने के लिए भविष्य के बारिश के आंकड़ों और मासिक खाद्य महंगाई की रिपोर्ट पर बारीकी से नजर रखेंगे।
