रुपये का गिरना और बढ़ती महंगाई का डर
पश्चिम एशिया में हालिया भू-राजनीतिक घटनाओं के कारण रुपये में लगातार गिरावट आ रही है, जिससे महंगाई बढ़ने का खतरा मंडराने लगा है। State Bank of India (SBI) के आर्थिक अनुसंधान विभाग ने कहा है कि रुपये में जो कमजोरी देखी जा रही है, वह भारत की आर्थिक सेहत के अनुरूप नहीं है और इससे 'इम्पोर्टेड इन्फ्लेशन' (Imported Inflation) का खतरा बढ़ सकता है। अप्रैल 2025 से फरवरी 2026 के बीच रुपया 6.39% गिर चुका है, और पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू होने के बाद इसमें और 3.63% की गिरावट आई है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि एक्सचेंज रेट केवल कुछ हद तक ही झटकों को झेल सकता है। इसके बजाय, बढ़ती अनिश्चितता कीमतों में व्यापक वृद्धि का कारण बन सकती है। इससे मॉनेटरी पॉलिसी (Monetary Policy) का असर कम होता है और प्राइस स्टेबिलिटी (Price Stability) पर सवाल खड़े होते हैं, जबकि कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) फिलहाल 5.5% के आसपास बना हुआ है। USD/INR एक्सचेंज रेट 83.50 के आसपास बना हुआ है, जो रुपये पर लगातार दबाव को दर्शाता है।
फंड जुटाना और रिजर्व बढ़ाना
इन खतरों से निपटने और बैलेंस ऑफ पेमेंट्स (BoP) के लगातार तीसरे साल घाटे में रहने की आशंका के बीच, SBI के अर्थशास्त्रियों ने कई उपायों का सुझाव दिया है। भारत के बैलेंस ऑफ पेमेंट्स (BoP) में घाटा काफी बड़ा रहा है, जिसका अनुमान FY2025-26 के लिए लगभग $20 बिलियन है। यह गहरे संरचनात्मक मुद्दों को दर्शाता है। भारतीय मूल के लोगों (diaspora) से पूंजी जुटाना एक व्यवहार्य विकल्प माना जा रहा है, लेकिन इसके लिए सावधानीपूर्वक योजना बनाने की जरूरत है ताकि 'धैर्यवान पूंजी' (patient capital) को आकर्षित किया जा सके। इसके साथ ही, सरकारी सिक्योरिटीज (G-Secs) को निवेशकों के लिए आकर्षक बनाना भी महत्वपूर्ण है, जिसके लिए टैक्स नियमों को सरल बनाना और विदहोल्डिंग टैक्स (Withholding Tax) की दर कम करना होगा। इससे भारतीय डेट में सीधे निवेश को बढ़ावा मिलेगा और बाहरी झटकों से बचाव के लिए फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व (Foreign Exchange Reserves) को मजबूती मिलेगी। यह 2013 के उस दौर की याद दिलाता है जब BoP की चिंताओं के कारण रुपये में भारी गिरावट आई थी।
भारत से बाहर जाने वाले पैसे को नियंत्रित करना
रिपोर्ट में कुछ कैपिटल आउटफ्लो (Capital Outflows) को सीमित करने का भी सुझाव दिया गया है। विदेशी डिपॉजिट (Overseas Deposits) के भुगतान और बड़ी गैर-ज़रूरी (non-essential) ट्रांसफर्स को अस्थायी रूप से प्रतिबंधित किया जा सकता है। SBI ने FY27 के लिए लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (Liberalised Remittance Scheme - LRS) की सालाना सीमा को कम करने का प्रस्ताव दिया है। इससे मेडिकल केयर या शिक्षा जैसे ज़रूरी खर्चों को प्राथमिकता मिलेगी, न कि गैर-ज़रूरी यात्रा पर होने वाले खर्चों को, जो विदेश भेजे जाने वाले पैसे का बड़ा हिस्सा हैं। कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं (emerging economies) में कैपिटल कंट्रोल (Capital Controls) सख्त होते हैं या विदेश पैसे भेजने की सीमा कम होती है। भारत की खुली LRS पॉलिसी, जो सालाना $250,000 तक की अनुमति देती है, वैश्विक स्तर पर निवेशक जब सुरक्षित संपत्तियों को तरजीह देते हैं तो बाहरी प्रवाह को बढ़ा सकती है। इसके अलावा, कस्टम ड्यूटी (Customs Duty) की समीक्षा करके घरेलू गोल्ड स्कीम (Gold Schemes) की प्रक्रियाओं को सरल बनाने से भी पूंजी जुटाने में मदद मिल सकती है।
अंदरूनी आर्थिक चिंताएं
ये प्रस्तावित उपाय लक्षणों को तो ठीक कर सकते हैं, लेकिन मूल समस्याओं का समाधान नहीं करते। भारत का सरकारी कर्ज-से-जीडीपी अनुपात (Debt-to-GDP Ratio) उच्च बना हुआ है, जो FY2025-26 के लिए लगभग 85% है। इससे सरकार की गुंजाइश सीमित हो जाती है। प्रवासियों से फंड जुटाने और आउटफ्लो को प्रबंधित करने पर निर्भरता, अपर्याप्त करंट अकाउंट सरप्लस (Current Account Surplus) और अस्थिर फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट (FPI) फ्लो से उत्पन्न भेद्यता को उजागर करती है। यदि वैश्विक लिक्विडिटी (Global Liquidity) टाइट होती है या भू-राजनीतिक जोखिम बढ़ते हैं, तो ये BoP सपोर्ट उपाय पर्याप्त नहीं हो सकते हैं। इससे करेंसी डेप्रिसिएशन (Currency Depreciation) का मुद्रास्फीति पर असर स्थायी हो सकता है और विकास-बाधाकारी (growth-hindering) कैपिटल कंट्रोल्स की मजबूरी पैदा हो सकती है।
बाजार का नज़रिया (Market Outlook)
विश्लेषक भारत के करेंसी आउटलुक (Currency Outlook) को लेकर सतर्क हैं, जो वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक घटनाओं के स्थायी प्रभाव की ओर इशारा करते हैं। वे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की हस्तक्षेप करने की क्षमता को स्वीकार करते हैं, लेकिन कई लोगों को उम्मीद है कि रुपया अस्थिर बना रहेगा। हालिया विश्लेषक टिप्पणियों से पता चलता है कि भारत की आर्थिक वृद्धि मजबूत है, लेकिन बाहरी वित्तीय झटकों और कमोडिटी (Commodity) की कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रति इसकी भेद्यता पर सावधानीपूर्वक नजर रखने और समय पर नीतिगत कार्रवाई की आवश्यकता है। निवेशक FY27 के दौरान मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने और रुपये को स्थिर करने पर इन प्रस्तावित बैलेंस ऑफ पेमेंट्स (BoP) उपायों की प्रभावशीलता पर करीब से नजर रखेंगे।
