ट्रेड डील की ख़ुशी पर अनिश्चितता का साया
अमेरिका के साथ एक अहम ट्रेड डील की घोषणा के बाद भारतीय रुपया पिछले तीन हफ्तों में सबसे अच्छी बढ़त दर्ज करने की राह पर था। इस डील के तहत भारतीय सामानों पर लगने वाले टैरिफ में बड़ी कटौती की उम्मीद है। लेकिन, शुक्रवार को ट्रेडिंग सेशन में यह उम्मीद थोड़ी फीकी पड़ गई, जब रुपया 90.67 प्रति डॉलर के स्तर पर फिसल गया। डील की बारीकियों का इंतजार कर रहे मार्केट पार्टिसिपेंट्स अभी भी सतर्क हैं। एक सरकारी बैंक के डीलर ने भी इस अनिश्चितता के चलते डॉलर की लगातार हो रही खरीद का जिक्र किया। यह स्थिति बताती है कि बाजार एक तरफ ट्रेड रिश्तों के सुधरने की उम्मीद कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ डील के असल अमल को लेकर थोड़ी चिंता में भी है।
रिकॉर्ड फॉरेक्स रिजर्व: मजबूती का बड़ा सहारा
करेंसी में दिनभर की इस उथल-पुथल के बीच, एक बड़ी राहत देने वाली खबर यह आई कि 30 जनवरी को खत्म हुए हफ्ते में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) 723.77 अरब डॉलर के रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया। यह मार्च 2025 के बाद की सबसे बड़ी साप्ताहिक बढ़ोतरी है। इस उछाल का मुख्य कारण सोने के रिजर्व में हुई भारी बढ़त है, जो 137 अरब डॉलर तक पहुंच गया, भले ही वैश्विक सोने की कीमतों में थोड़ी नरमी दिखी हो। IDFC फर्स्ट बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री गौरा सेन गुप्ता के मुताबिक, फॉरेक्स रिजर्व में कुल वृद्धि का सबसे बड़ा कारण 20.4 अरब डॉलर का रिवैल्यूएशन गेन (revaluation gain) रहा, भले ही रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने इस हफ्ते 6.3 अरब डॉलर की शुद्ध बिकवाली की हो। रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा यह भंडार RBI को किसी भी अतिरिक्त करेंसी अस्थिरता से निपटने के लिए काफी क्षमता देता है, और जब तक सट्टेबाजी का दबाव न बढ़े, तब तक बड़े इंटरवेंशन की जरूरत महसूस नहीं होगी।
RBI का सधा हुआ कदम और मैक्रो फैक्टर्स
भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने इस बात की पुष्टि की है कि केंद्रीय बैंक आम तौर पर करेंसी को मार्केट के भरोसे पर छोड़ता है, लेकिन अगर सट्टेबाजी का दबाव बढ़ता है तो वे हस्तक्षेप करेंगे। फिलहाल, मल्होत्रा के अनुसार, सट्टेबाजी के ऐसे कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं, जिसका मतलब है कि रुपये की दिशा काफी हद तक बाजार ही तय करेगा। इस साल की शुरुआत में, ट्रेड डील से पहले, रुपये में करीब 5.4% की कमजोरी आई थी। एनालिस्ट्स का कहना है कि इक्विटी से पूंजी का बाहर जाना और मार्केट वैल्यूएशन को लेकर चिंताएं, साथ ही भुगतान संतुलन (Balance of Payments) पर व्यापक बाहरी दबाव, पहले की गिरावट के कुछ कारण रहे हैं। ट्रेड डील एक बड़ा बूस्ट दे सकती है, लेकिन इसका टिकाऊ असर डील के अमल होने के ठोस प्लान पर और विदेशी पूंजी के लगातार आने पर निर्भर करेगा। आम तौर पर उभरते बाजार की करेंसी (Emerging Market currencies) ने 2026 की अच्छी शुरुआत की है, MSCI EM इंडेक्स डॉलर के मुकाबले करीब 11% बढ़ा है, लेकिन रुपये का प्रदर्शन साल की शुरुआत में थोड़ा कमजोर रहा था। भारत के फिस्कल डेफिसिट (fiscal deficits) और ऊंचे उधार की जरूरतें भी भविष्य में एक चुनौती पेश कर सकती हैं।
आगे क्या? विश्लेषकों की राय
रुपये के भविष्य के बारे में रॉयटर्स (Reuters) के सर्वे में शामिल स्ट्रैटेजिस्ट्स का मानना है कि आने वाले कुछ महीनों में यह एक सीमित दायरे में ही ट्रेड करेगा। अप्रैल 2026 के अंत तक यह 90.19 और जुलाई तक 90.63 प्रति डॉलर रह सकता है, जबकि साल के अंत तक यह 91 के आसपास रहने की उम्मीद है। यह दर्शाता है कि फिलहाल बहुत बड़ी रिकवरी की उम्मीद नहीं है। हालांकि, बैंक ऑफ अमेरिका (Bank of America) ने पहले ही मार्च 2026 के अंत तक रुपया 88.60-89.00 तक मजबूत होने का अनुमान लगाया था, जो विश्लेषकों के बीच अलग-अलग राय को दिखाता है। रुपये की मजबूती ट्रेड एग्रीमेंट की स्पष्टता और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) के लगातार आने पर निर्भर करेगी। फरवरी के शुरुआती दिनों में 1 अरब डॉलर का शुद्ध निवेश आया है, जबकि जनवरी में 4 अरब डॉलर की बिकवाली हुई थी। कुल मिलाकर, उभरते बाजारों का माहौल अभी भी पॉजिटिव है, लेकिन निवेश में समझदारी से काम लेना होगा।