डॉलर के मुकाबले क्यों हारा रुपया?
यह गिरावट विदेशी बाजारों से मिले कमजोर संकेतों और लगातार हो रही FII की बिकवाली का नतीजा है। आमतौर पर जब डॉलर कमजोर होता है और कच्चे तेल की कीमतें गिरती हैं, तो भारतीय रुपया मजबूत होता है। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ, जो भारतीय बाजार के लिए चिंता का विषय है।
FII की बिकवाली और शेयर बाजार में गिरावट
शुक्रवार, 27 फरवरी 2026 को, भारतीय रुपया 90.91 पर खुला और दिन के कारोबार में 4 पैसे की गिरावट के साथ $90.95 के स्तर पर आ गया। इसकी मुख्य वजह विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) द्वारा लगातार की जा रही बिकवाली है। गुरुवार, 26 फरवरी 2026 को FIIs ने ₹3,465.99 करोड़ के शेयर बेचे। इस बिकवाली के दबाव में घरेलू शेयर बाजार भी गिरे, जहाँ सेंसेक्स 364.62 अंक और निफ्टी 117.15 अंक नीचे चले गए। फंड्स को वापस भेजने की मांग बढ़ने से भी रुपये पर दबाव बढ़ा।
एशिया के बाकी देशों से पिछड़ा भारत
भारतीय रुपये का प्रदर्शन इस समय एशिया के अन्य देशों की मुद्राओं के मुकाबले काफी कमजोर रहा है। जहाँ डॉलर इंडेक्स 0.09% घटकर 97.70 पर था और ब्रेंट क्रूड के दाम भी गिरे थे, वहीं चीनी युआन (Chinese Yuan) जैसी कई एशियाई मुद्राएँ डॉलर के मुकाबले मजबूत हुईं। दक्षिण कोरियाई वॉन (South Korean Won), इंडोनेशियाई रुपिया (Indonesian Rupiah) और थाई बाथ (Thai Baht) जैसी मुद्राओं में भी स्थिरता या मजबूती देखी गई।
2025 और 2026 की शुरुआत से ही FIIs ने भारतीय शेयर बाजारों से भारी बिकवाली की है, जिसका कुल अनुमान ₹4.5-5.0 लाख करोड़ है। इस वजह से रुपया 2025 के अंत और 2026 की शुरुआत में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली एशियाई मुद्रा बन गया था, भले ही डॉलर इंडेक्स कमजोर था और तेल की कीमतें गिरी हुई थीं।
हालांकि, जनवरी 2026 में भारत की महंगाई दर 2.75% पर रही, जो RBI के लक्ष्य के भीतर है। इससे रिजर्व बैंक को मॉनेटरी पॉलिसी में ढील देने की गुंजाइश मिलती है, लेकिन फॉरेन इन्वेस्टर्स के लिए यह कम यील्ड (Yield) का संकेत भी देता है, जिससे वे पैसा निकालकर दूसरी जगहों पर निवेश कर सकते हैं, खासकर जब ग्लोबल यील्ड आकर्षक हो।
स्ट्रक्चरल दिक्कतें और ट्रेड की अनिश्चितता
भारतीय रुपये पर कुछ पुरानी स्ट्रक्चरल दिक्कतें भी हावी हैं, जो इसे ग्लोबल झटकों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाती हैं। देश का बड़ा ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit), खास तौर पर कच्चे तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और सोने के आयात के कारण, फॉरेन एक्सचेंज की मांग लगातार बनाए रखता है। यह रुपये पर संरचनात्मक दबाव डालता है।
इसमें फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) पर बढ़ती निर्भरता भी शामिल है, जिनकी सेंटिमेंट (Sentiment) तेजी से बदल सकती है। इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 में भी कहा गया था कि ये असंतुलन रुपये की क्षमता से कम प्रदर्शन का कारण बन रहे हैं।
इसके अलावा, टैरिफ (Tariff) और ट्रेड (Trade) को लेकर अनिश्चितताएँ, खासकर अमेरिका के साथ, फॉरेन इन्वेस्टमेंट को हतोत्साहित कर रही हैं और करेंसी में अस्थिरता बढ़ा रही हैं। MUFG के एनालिस्ट्स का अनुमान है कि 2026 तक रुपया कमजोर बना रह सकता है, क्योंकि फिस्कल कंसॉलिडेशन (Fiscal Consolidation) की गति धीमी है और बॉरोइंग रिक्वायरमेंट्स (Borrowing Requirements) बढ़ी हैं, जो बॉन्ड मार्केट और फॉरेन इनफ्लो (Foreign Inflows) के लिए हेडविंड (Headwind) बन सकती हैं।
RBI की फ्लेक्सिबल एक्सचेंज रेट (Flexible Exchange Rate) की ओर नीतिगत बदलाव, जहाँ वह केवल अत्यधिक अस्थिरता को कम करने के लिए हस्तक्षेप करती है, न कि किसी खास लेवल को बनाए रखने के लिए, रुपये में धीरे-धीरे गिरावट को अनुमति देती है।
आगे क्या उम्मीद करें?
आगे चलकर, एनालिस्ट्स का अनुमान है कि रुपया निकट भविष्य में दबाव में रह सकता है और $90-92 के दायरे में बना रह सकता है। यह ट्रेड डील (Trade Deal) की प्रगति और कैपिटल फ्लो (Capital Flows) पर निर्भर करेगा। कुछ अनुमानों के अनुसार, अगर ट्रेड एग्रीमेंट (Trade Agreements) होते हैं और फ्लो स्थिर होता है, तो 2026 के अंत तक यह 86-87 के दायरे में मजबूत हो सकता है।
हालांकि, तत्काल Outlook (Outlook) सतर्कता भरा है। अक्टूबर 2026 से लागू होने वाले नए फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट (Export and Import of Goods and Services) रेगुलेशंस, 2026, ट्रेड प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने का लक्ष्य रखते हैं, लेकिन उनका करेंसी की स्थिरता पर अंतिम प्रभाव देखना बाकी है।