भारतीय रुपया पिछले छह हफ्तों में अपनी सबसे अच्छी चाल दिखाते हुए अमेरिकी डॉलर के मुकाबले **70 पैसे** मजबूत हुआ है। ग्लोबल क्रूड ऑयल की गिरती कीमतों और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के दखल ने रुपये को सहारा दिया है। इसके अलावा, FCNR-B डिपॉजिट्स से बड़े विदेशी मुद्रा इनफ्लो की उम्मीदें भी रुपये पर पड़ रहे दबाव को कम कर रही हैं।
Detailed Coverage
क्यों मजबूत हुआ रुपया?
28 जुलाई, 2026 को भारतीय रुपये ने अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 15 पैसे की मजबूती के साथ 95.76 के स्तर पर शुरुआत की। इस सत्र में रुपये में कुल 70 पैसे की मजबूती आई, जो पिछले छह हफ्तों में सबसे ज्यादा है। बाजार की सेंटिमेंट में यह बदलाव ग्लोबल ऑयल की कीमतों में नरमी और केंद्रीय बैंक की सक्रिय भूमिका का नतीजा है।
डॉलर की मांग में कमी
रुपये को मजबूत करने के पीछे एक बड़ा कारण ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतों में आई गिरावट है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच संभावित राजनयिक प्रगति की खबरों के बीच कीमतें $87 प्रति बैरल के करीब कारोबार कर रही थीं। भारत कच्चे तेल का एक बड़ा आयातक है, इसलिए आयात के भुगतान के लिए डॉलर की मांग कम होने से रुपये को सहारा मिलता है। बाजार के जानकारों का मानना है कि RBI ने स्पॉट मार्केट में डॉलर बेचकर रुपये को 97 प्रति डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार करने से रोकने की कोशिश की है।
विदेशी निवेश से उम्मीदें
फाइनेंशियल एनालिस्ट्स का कहना है कि बड़े पूंजी इनफ्लो की उम्मीदें भी रुपये के लिए सपोर्ट का काम कर रही हैं। बाजार फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट (बैंक) या FCNR-B डिपॉजिट्स से होने वाले इनफ्लो पर नजर रखे हुए है, जिसके करीब $32 अरब तक पहुंचने का अनुमान है। इन डिपॉजिट्स में नॉन-रेजिडेंट भारतीयों द्वारा भारतीय बैंकों में रखी गई विदेशी मुद्रा शामिल है, जिससे लोकल मार्केट में डॉलर की सप्लाई बढ़ सकती है और एक्सचेंज रेट स्थिर हो सकता है।
बाजार पर असर
हालांकि, ऑयल कंपनियों और अन्य आयातकों के लिए नियमित बिजनेस ऑपरेशंस के चलते डॉलर की खरीद जारी है, लेकिन विदेशी इनफ्लो और केंद्रीय बैंक के एक्शन से बढ़ी डॉलर सप्लाई ने इसे सोख लिया है। निवेशकों और बिजनेसेज के लिए, रुपये की स्थिरता महंगाई, इंपोर्टेड रॉ मैटेरियल्स की लागत और विदेशी कर्ज वाली कंपनियों की कमाई को प्रभावित करती है। अगर रुपया स्थिर रहता है या और मजबूत होता है, तो एनर्जी और कंपोनेंट्स के इंपोर्ट पर निर्भर सेक्टर के लिए लागत का बोझ कम हो सकता है। आने वाले सत्रों में विदेशी पूंजी के लगातार फ्लो और ग्लोबल क्रूड ऑयल की कीमतों की अस्थिरता पर नजर रहेगी, जो तय करेगा कि रुपया अपनी इस बढ़त को बनाए रख पाता है या नहीं।
