**### कानूनी फैसले के बावजूद क्यों नहीं संभल रहा रुपया?
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20 फरवरी 2026 को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) के तहत लगाए गए टैरिफ को रद्द कर दिया। इस फैसले से अमेरिकी डॉलर पर शुरुआत में दबाव आया था, लेकिन यह भारतीय रुपये (INR) में मजबूत रिकवरी लाने के लिए काफी नहीं था।
इसके तुरंत बाद, अमेरिकी प्रशासन ने 1974 के ट्रेड एक्ट के सेक्शन 122 के तहत 15% का एक नया ग्लोबल टैरिफ लागू कर दिया। यह फैसला शुरुआती 150 दिनों के लिए मान्य है और इसे कांग्रेस की मंजूरी का इंतजार है। विश्लेषकों का मानना है कि इससे भारत की प्रभावी टैरिफ दर 11-13% के आसपास आ सकती है, जो पहले से कम है। हालांकि, यह कदम अमेरिकी पॉलिसी में अनिश्चितता को फिर से बढ़ा रहा है।
24 फरवरी 2026 तक, USD/INR की जोड़ी लगभग 90.9926 के स्तर पर कारोबार कर रही थी। डॉलर की मांग और वैश्विक अनिश्चितताओं के चलते रुपया हाल ही में 91 के स्तर को छू रहा था। रिपोर्टों के अनुसार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने रुपये में तेज उतार-चढ़ाव को रोकने के लिए 90.70-90.80 के स्तर पर हस्तक्षेप किया है।
**### वैश्विक व्यापार की अनिश्चितता और उभरते बाज़ार
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अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला वैश्विक व्यापार नीति की अनिश्चितता को और बढ़ाता है, जिसका असर उभरते बाज़ारों (Emerging Markets) पर पहले से ही दिख रहा था। जनवरी 2026 में MSCI EM इंडेक्स में 8.9% की बढ़त देखी गई, जिसका एक बड़ा कारण कमजोर डॉलर था। यह दर्शाता है कि कैसे कमजोर डॉलर उभरते बाज़ारों के लिए एक सकारात्मक संकेत हो सकता है।
भारत की बात करें तो, 2025 की दूसरी छमाही में व्यापार घाटा कम हो रहा था, और Q3 2025 में चालू खाता घाटा (CAD) जीडीपी का 1.3% था। FY2026 के लिए CAD के 1.1-1.2% रहने का अनुमान है, जो मजबूत सेवाओं के निर्यात से समर्थित है। हालांकि, अक्टूबर 2025 में मर्चेंडाइज आयात 76.1 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था।
**### विदेशी निवेश का पैसा निकलना - सबसे बड़ी चिंता
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हालांकि, भारतीय रुपये के लिए सबसे बड़ी चिंता फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट (FPI) का लगातार पैसा बाहर जाना है। जनवरी 2026 में रिकॉर्ड 1 ट्रिलियन रुपये से अधिक का FPI पैसा भारतीय बाज़ारों (शेयर और बॉन्ड) से बाहर निकला। यह रुझान फरवरी में भी जारी रहा, जिससे विदेशी निवेशक वैल्यूएशन संबंधी चिंताओं और वैश्विक अनिश्चितताओं के कारण जोखिम से बचने (Risk-off) की रणनीति अपना रहे हैं।
इस लगातार पूंजी निकासी से रुपये पर सीधा दबाव पड़ता है। 91 प्रति डॉलर का स्तर एक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक सीमा बन गया है, जिसके पार जाने पर RBI के हस्तक्षेप की उम्मीद रहती है। कुछ विश्लेषक साल के अंत 2026 तक रुपये के 86-88 तक मजबूत होने का अनुमान लगा रहे हैं, जबकि अन्य इसे 90-91 के आसपास ही बने रहने की चेतावनी दे रहे हैं। Goldman Sachs ने तो USD/INR का टारगेट 81.50 कर दिया है।
**### भविष्य का नज़रिया: नीतिगत अनिश्चितता के बीच राह
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निकट भविष्य में रुपये की दिशा अमेरिकी व्यापार नीति की बदलती व्याख्या, वैश्विक जोखिम की भावना और डॉलर की मांग पर निर्भर करेगी। Trading Economics के मॉडल के अनुसार, 2026 की पहली तिमाही के अंत तक USD/INR 90.57 और 12 महीनों में 89.21 रहने का अनुमान है। हालांकि, अमेरिकी प्रशासन से नए संरक्षणवादी उपायों का खतरा बना हुआ है। उभरते बाज़ारों की संभावित मजबूती और कमजोर डॉलर के बावजूद, FPI का लगातार बाहर जाना यह दर्शाता है कि निवेशक नीतिगत स्पष्टता को अधिक महत्व दे रहे हैं। भारत की संरचनात्मक ताकतें, जैसे कि प्रबंधनीय CAD और मजबूत सेवा निर्यात, कुछ हद तक लचीलापन प्रदान करती हैं, लेकिन अस्थिर वैश्विक व्यापार वातावरण और अमेरिकी नीति में अप्रत्याशित बदलाव रुपये में लगातार मजबूती के लिए चुनौतियां पेश करते रहेंगे।