अंतर्राष्ट्रीय बाजार से मिले संकेतों के चलते भारतीय रुपया आज **38** पैसे की गिरावट के साथ **$1** के मुकाबले **95.70** पर खुला। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के कारण ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें **$79** प्रति बैरल के ऊपर चली गई हैं, जिससे भारत के आयात बिल और व्यापार संतुलन पर दबाव बढ़ने की आशंका है।
रुपये पर तेल की कीमतों का असर
मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक अनिश्चितता के कारण वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखी गई है, जिसका सीधा असर भारतीय रुपये पर पड़ा है। आज, 13 जुलाई को रुपया 38 पैसे टूटकर 95.70 के स्तर पर खुला, जो पिछले दिन के 95.32 के मुकाबले एक बड़ी गिरावट है।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, ऐसे में कच्चे तेल के दाम बढ़ने का मतलब है कि आयात के लिए डॉलर की मांग बढ़ जाती है। इस बढ़ी हुई मांग से रुपये पर दबाव बनता है। ब्रेंट क्रूड ऑयल का $79 प्रति बैरल के पार जाना, भारत के व्यापार घाटे (Trade Deficit) को लेकर चिंता बढ़ा रहा है। व्यापार घाटा, निर्यात और आयात के मूल्य का अंतर होता है।
महंगाई और RBI पर असर?
लगातार ऊंचे तेल के दाम घरेलू महंगाई (Inflation) को भी बढ़ा सकते हैं। ट्रांसपोर्टेशन और मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर में इस्तेमाल होने वाली ऊर्जा की लागत बढ़ने से वस्तुओं और सेवाओं के दाम बढ़ सकते हैं। निवेशक इस बात पर भी नजर रखेंगे कि क्या इससे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ब्याज दर नीति पर कोई असर पड़ता है या नहीं। ट्रांसपोर्ट, केमिकल्स और एविएशन जैसे तेल पर निर्भर सेक्टरों के मुनाफे पर भी इसका असर दिख सकता है।
डॉलर की मजबूती का फैक्टर
रुपये की कमजोरी सिर्फ तेल की कीमतों के कारण ही नहीं है, बल्कि वैश्विक स्तर पर अमेरिकी डॉलर (US Dollar) की मजबूती भी एक बड़ा कारण है। भू-राजनीतिक तनाव के समय, निवेशक अक्सर डॉलर को एक सुरक्षित निवेश (Safe Haven) मानते हुए उसमें पैसा लगाते हैं। इसके अलावा, उम्मीद है कि प्रमुख केंद्रीय बैंक महंगाई को नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचा रख सकते हैं, जिससे डॉलर को और मजबूती मिल रही है।
हालांकि, चीनी युआन और इंडोनेशियाई रुपिया जैसी कुछ एशियाई मुद्राओं में हल्की बढ़त देखी गई, लेकिन जापानी येन और दक्षिण कोरियाई वोन पर भी दबाव रहा।
आगे क्या?
बाजार की नजर अब इस बात पर रहेगी कि मध्य पूर्व में आगे क्या होता है और क्या तेल की कीमतें स्थिर होती हैं या और बढ़ती हैं। ऊर्जा बाजारों में किसी भी लंबी अवधि की अस्थिरता से रुपये में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है। निवेशक भारत के व्यापार घाटे के नवीनतम आंकड़ों का भी इंतजार करेंगे ताकि तेल की कीमतों में बदलाव का देश की वित्तीय स्थिरता पर वास्तविक प्रभाव समझा जा सके।
