पूंजी की निकासी के बीच करेंसी में मजबूती
एक अस्थिर ट्रेडिंग सेशन के बाद रुपये में मामूली मजबूती देखी गई। इसने मजबूत डॉलर और विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की लगातार बिकवाली के दबाव को पार कर लिया। रुपया पिछले बंद स्तर से 12 पैसे मजबूत हुआ। हालांकि, बाजार में गिरती ऊर्जा लागत और जारी पूंजी बहिर्वाह (Capital Outflow) दिख रहा है, जो एक विसंगति को उजागर करता है। घरेलू शेयर बाजार में भी कमजोरी रही, जहां संस्थागत निवेशकों ने ₹1,000 करोड़ से अधिक की संपत्तियां बेचीं। यह सावधानी का संकेत है जो केंद्रीय बैंक के आगामी फैसलों को जटिल बना देगा।
तेल की कीमतों ने रुपये को दिया सहारा
रुपये का हालिया प्रदर्शन आयातित ऊर्जा लागत से गहरा संबंध दिखाता है। ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) की कीमतों में 3.02% की गिरावट ने बहुत जरूरी सहारा दिया, जिससे भारत के चालू खाते (Current Account) की चिंताएं कम हुईं। वैश्विक तेल की कीमतों में इस गिरावट के बिना, अमेरिका-ईरान भू-राजनीतिक मुद्दों (US-Iran Geopolitical Issues) और इक्विटी (Equity) की लगातार बिकवाली का संयुक्त प्रभाव रुपये को 95.70 के स्तर से नीचे धकेल सकता था। डॉलर इंडेक्स (Dollar Index) 99.07 के आसपास बना हुआ है, जो लगातार दबाव डाल रहा है। यह बताता है कि रुपये की वर्तमान स्थिरता मजबूत घरेलू आर्थिक विकास से अधिक गिरती कमोडिटी (Commodity) कीमतों पर निर्भर करती है।
RBI के सामने जटिल नीति परिदृश्य
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) 3 जून की अपनी बैठक से पहले एक चुनौतीपूर्ण माहौल का सामना कर रहा है। नीति निर्माताओं को मुद्रास्फीति (Inflation) की उम्मीदों को प्रबंधित करने और मुद्रा के अवमूल्यन (Currency Depreciation) को रोकने के बीच संतुलन बनाना होगा, जिससे आयातित मुद्रास्फीति बढ़ सकती है। मध्य पूर्व (Middle East) में अस्थिरता की पिछली अवधियों से पता चलता है कि केंद्रीय बैंक महत्वपूर्ण ब्याज दर (Interest Rate) में बदलाव करने के बजाय मुद्रा अस्थिरता को नियंत्रित करने पर ध्यान केंद्रित करता है। हालांकि कच्चे तेल की कम कीमतों से अस्थायी राहत मिली है, विदेशी निवेशकों की जारी बिकवाली वर्तमान ब्याज दर परिदृश्य में घरेलू मूल्यांकन के बारे में संदेह का संकेत देती है।
टिकाऊ मजबूती पर चिंताएं
विश्लेषकों का कहना है कि मौजूदा बाजार में संरचनात्मक कमजोरियां हैं। इक्विटी बाजार से लगातार बहिर्वाह के साथ रुपये की स्पष्ट ताकत बताती है कि यह रिकवरी स्थायी नहीं हो सकती है। यदि तेल की कीमतें फिर से बढ़ती हैं, तो संस्थागत निवेश की कमी से रुपया तेजी से गिर सकता है। अस्थिरता को प्रबंधित करने के लिए रिजर्व बैंक के हस्तक्षेप पर निर्भर रहने से सुरक्षा का झूठा एहसास हो सकता है, जो बढ़ते राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) के प्रभाव को छिपा सकता है। यदि आगामी मौद्रिक नीति बैठक इन बहिर्वाहों के प्रबंधन पर स्पष्ट मार्गदर्शन प्रदान नहीं करती है, तो मुद्रा तेजी से गिर सकती है, जिससे स्थायी सुधार की क्षमता सीमित हो जाएगी।
