बुधवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 5 पैसे मजबूत हुआ। वैश्विक बाजारों में डॉलर के नरम पड़ने और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक जोखिमों के बावजूद यह मजबूती आई है। हालांकि, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की लगातार निकासी से घरेलू मुद्रा की स्थिरता पर असर पड़ रहा है।
रुपया हुआ थोड़ा मजबूत, पर चिंताएं बरकरार
बुधवार को शुरुआती कारोबार में भारतीय रुपये में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 5 पैसे की मामूली मजबूती दर्ज की गई। रुपया 96.11 के स्तर पर पहुंच गया। यह मजबूती वैश्विक स्तर पर अमेरिकी डॉलर के कमजोर पड़ने और लगातार बढ़ते ऊर्जा खर्चे व विदेशी पूंजी की निकासी के दबाव के बीच संतुलन को दर्शाती है।
पश्चिम एशिया के तनाव और एनर्जी कीमतों का असर
पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक अस्थिरता बाजारों के लिए एक बड़ी चिंता बनी हुई है। ईरान की ओर से एनर्जी एक्सपोर्ट (energy export) को बाधित करने की चेतावनी के बाद तनाव और बढ़ गया है। इस घटनाक्रम के चलते ब्रेंट क्रूड (Brent crude) की कीमतें 1.10% से अधिक बढ़कर $85.66 प्रति बैरल हो गईं। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, ऐसे में कच्चे तेल की ऊंची कीमतें अक्सर ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (oil marketing companies) द्वारा डॉलर की मांग बढ़ा देती हैं, जिससे रुपये पर दबाव पड़ता है।
घरेलू बाजार और FII की गतिविधियां
बाहरी चुनौतियों के बावजूद, घरेलू शेयर बाजारों (local equities) ने कुछ सहारा दिया। बीएसई सेंसेक्स (BSE Sensex) 550 अंक से अधिक की बढ़त के साथ खुला, जिससे बाजार की सेंटिमेंट (market sentiment) में सुधार हुआ और रुपये को मदद मिली। हालांकि, मुद्रा विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की गतिविधियों के प्रति संवेदनशील बनी हुई है। एक्सचेंज डेटा से पता चलता है कि FII मंगलवार को नेट सेलर्स (net sellers) थे, जिन्होंने इक्विटी में लगभग ₹739.69 करोड़ की बिकवाली की। इन निवेशकों की लगातार बिकवाली रुपये की डॉलर के मुकाबले महत्वपूर्ण रिकवरी की क्षमता को सीमित करने वाला एक स्ट्रक्चरल फैक्टर (structural factor) बनी हुई है।
आर्थिक आंकड़े और महंगाई
घरेलू आर्थिक संकेतक मिले-जुले संकेत दे रहे हैं। जून के लिए थोक मूल्य महंगाई (Wholesale Price Inflation) बढ़कर 9.87% हो गई, जो मई में 9.68% थी। यह वृद्धि मुख्य रूप से खाद्य पदार्थों और गैर-खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण हुई है, जिसका असर मॉनेटरी पॉलिसी (monetary policy) की उम्मीदों पर पड़ सकता है। फिस्कल फ्रंट (fiscal front) पर, डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन (direct tax collections) में मजबूती दिखी है, जो चालू फाइनेंशियल ईयर (financial year) में 13 जुलाई तक 16.40% बढ़कर ₹6.51 लाख करोड़ से अधिक हो गया है। यह कॉर्पोरेट टैक्स इनफ्लो (corporate tax inflows) से समर्थित है। यह राजस्व वृद्धि रुपये की अस्थिरता के बीच कुछ फिस्कल स्थिरता प्रदान करती है।
रुपया हाल ही में ऊंचे अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड (US Treasury yields) और डॉलर की बढ़ी हुई मांग के कारण मई के बाद पहली बार 96 के स्तर को पार कर गया था। विश्लेषकों का अनुमान है कि आगे चलकर यह करेंसी 95.90 से 96.50 के दायरे में कारोबार कर सकती है। निवेशकों को ब्रेंट क्रूड की कीमतों में उतार-चढ़ाव, FII की ट्रेडिंग पैटर्न और पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक स्थिति से जुड़े आगे के अपडेट्स पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि ये कारक करेंसी की तत्काल दिशा तय करने की संभावना रखते हैं।
