रुपये की चाल और बाज़ार का उलटफेर
HDFC Bank के अरुप रक्षित का मानना है कि भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 90 से 92 के बीच ही बना रहेगा। इस स्थिरता के पीछे हालिया टैरिफ नीति में बदलाव और घरेलू चिंताओं से हटकर वैश्विक व्यापार और भू-राजनीतिक (geopolitical) घडामोडी पर फोकस बढ़ना मुख्य कारण हैं। ऐतिहासिक रूप से, उभरते बाज़ारों की करेंसियां (currencies) वैश्विक अनिश्चितताओं के प्रति संवेदनशील रहती हैं। हाल ही में अमेरिकी टैरिफ के कारण निर्यात को कुछ दिक्कतें आईं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद ड्यूटी कम हुई है, हालांकि अनिश्चितता बनी हुई है। $62 अरब के शॉर्ट फॉरवर्ड बुक और बड़े सॉवरेन बॉरोइंग के बावजूद, भारत का फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व रिकॉर्ड $725.7 अरब पर है, जो करेंसी की अस्थिरता से निपटने में मदद करेगा।
सेक्टर्स में बड़ा अंतर, निवेश की चुनौती
3R Investment Management के नीरज सेठ बताते हैं कि शेयर बाज़ार में विभिन्न सेक्टर्स के बीच भारी अंतर (divergence) देखने को मिल रहा है, जिससे इंडेक्स-आधारित निवेश मुश्किल हो गया है। 23 फरवरी 2026 तक, सेंसेक्स और निफ्टी-50 जैसे बड़े इंडेक्स मामूली बढ़त दिखा रहे थे, जिसमें पीएसयू बैंक (PSU Banks) और हॉस्पिटल्स ने सहारा दिया। वहीं, मिड-कैप्स में गिरावट आई, जबकि स्मॉल-कैप्स और माइक्रो-कैप्स में सट्टा (speculative) तेज़ी देखी गई। फाइनेंसियल सेक्टर निवेशकों की पसंदीदा जगह बनी हुई है, क्योंकि उनके बैलेंस शीट मजबूत हैं। भारतीय फाइनेंसियल सेक्टर का 3-साल का औसत P/E रेश्यो 16.6x है। इसके विपरीत, कंज्यूमर डिस्क्रिशनरी सेक्टर का इंडस्ट्री P/E 46.5x पर काफी ऊंचा है, जो 3-साल के औसत से ऊपर है, हालांकि इस सेक्टर में कमजोरी देखी गई है। एनबीएफसी (NBFCs), कमर्शियल व्हीकल और कंज्यूमर डिस्क्रिशनरी में मौके देखे जा रहे हैं, लेकिन आईटी सर्विसेस और महंगे वैल्युएशन वाले सेक्टर्स में सावधानी बरतने की सलाह दी गई है।
AI का असर और IT सेक्टर पर दबाव
AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) से होने वाले आर्थिक बदलावों की चिंताएं तो हैं, लेकिन नीरज सेठ के मुताबिक इसका तत्काल बड़ा मैक्रोइकॉनॉमिक (macroeconomic) असर होने की उम्मीद कम है। AI का आर्थिक प्रभाव धीरे-धीरे सामने आएगा। अनुमान है कि AI, 2035 तक भारत की जीडीपी (GDP) में $550 अरब से लेकर $15.7 ट्रिलियन तक का योगदान दे सकता है और लाखों नई नौकरियां पैदा कर सकता है। हालांकि, भारतीय आईटी सर्विसेस सेक्टर में बड़ा वैल्यूएशन करेक्शन (valuation correction) देखने को मिल रहा है। TCS का P/E रेश्यो 20.6x और Infosys का 19.1x है, जो कुछ विश्लेषकों के बताए 15x के टारगेट से काफी ऊपर है। निफ्टी आईटी इंडेक्स फिलहाल करीब 22.7x के P/E पर ट्रेड कर रहा है, जबकि निफ्टी 50 इंडेक्स का P/E लगभग 22.4x है।
IT और कंज्यूमर सेक्टर्स पर मंदी का साया
फरवरी 2026 में आईटी सेक्टर में भारी गिरावट आई, जिसमें निफ्टी आईटी इंडेक्स पिछले एक साल में लगभग 22% गिर गया। यह गिरावट इस डर से और बढ़ गई है कि जनरेटिव AI (generative AI) टूल्स कई कामों को ऑटोमेट कर सकते हैं, जिससे बड़ी आईटी कंपनियों के वैल्यूएशन में भारी कमी आ सकती है। कंज्यूमर डिस्क्रिशनरी सेक्टर में ग्रोथ की उम्मीदों के बावजूद, 46.5x का ऊंचा P/E वैल्यूएशन काफी खिंचा हुआ (stretched) लगता है, जो आगे चलकर मंदी (slowdown) की स्थिति में इसे और कमजोर बना सकता है। अमेरिकी व्यापार नीतियों और टैरिफ को लेकर लगातार बनी अनिश्चितता भी निर्यात-उन्मुख (export-oriented) सेक्टर्स के लिए मुश्किल खड़ी कर रही है। मजबूत फाइनेंसियल सेक्टर के विपरीत, आईटी सेक्टर का भविष्य चुनौतीपूर्ण लग रहा है, जहां राजस्व वृद्धि (revenue growth) सिंगल डिजिट के मध्य में रहने का अनुमान है, जिससे यह ब्रॉडर मार्केट से पिछड़ सकता है।
भविष्य की राह: कमाई में सुधार की उम्मीद
फाइनेंशियल, मैन्युफैक्चरिंग और इंडस्ट्रियल कंपनियों में कमाई (earnings) में सुधार के शुरुआती संकेत मिल रहे हैं, और पूंजीगत व्यय (capital expenditure) तथा क्रेडिट ग्रोथ के सहारे यह गति पूरे साल बने रहने की उम्मीद है। मोतीलाल ओसवाल (Motilal Oswal) का अनुमान है कि 2026 में कमाई में रिवाइवल भारतीय शेयरों को मजबूती देगा। वे आईटी सर्विसेस को 'माईल्डली ओवरवेट' (mildly overweight) बता रहे हैं, जबकि डाइवर्सिफाइड फाइनेंसियल्स, ऑटोमोबाइल और टेलीकॉम को प्राथमिकता दे रहे हैं। विश्लेषकों के अनुमान के मुताबिक, डॉलर/रुपया एक्सचेंज रेट चालू तिमाही के अंत तक लगभग 90.57 और 12 महीने में 89.21 पर रह सकता है। भारतीय रिज़र्व बैंक की फॉरेन-एक्सचेंज रणनीति और बड़े विदेशी मुद्रा भंडार (foreign exchange reserves) करेंसी में अस्थिरता से सुरक्षा प्रदान करते हैं।