ट्रेड डील और भू-राजनीतिक तनाव का दोहरा झटका
भारतीय रुपया (Indian Rupee) में आई नरमी के पीछे कई बड़े कारण हैं। हाल ही में अमेरिका के साथ हुए ट्रेड डील (Trade Deal) के ऐलान और दुनियाभर में बढ़ रहे भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Tensions) ने भारतीय करेंसी पर भारी दबाव बना दिया है। ये वजहें एफपीआई (FPI) के निवेश से मिले शुरुआती सकारात्मक संकेतों पर भारी पड़ रही हैं, खासकर तब जब भारत का IT सेक्टर भी सुस्ती से जूझ रहा है।
ट्रेड डील का इंपोर्ट बिल पर असर
अमेरिका के साथ हुए नए समझौते के तहत, भारत ने अमेरिकी औद्योगिक और कृषि उत्पादों पर टैरिफ (Tariff) को कम करने या खत्म करने का वादा किया है। व्हाइट हाउस की ओर से जारी एक फैक्ट शीट के अनुसार, भारत अमेरिका से ऊर्जा, आईसीटी (ICT) और कृषि जैसे क्षेत्रों में 500 अरब डॉलर से अधिक के सामान की खरीद भी बढ़ाएगा। यह भारत के लिए इंपोर्ट (Import) को बढ़ाएगा और डॉलर की मांग बढ़ाएगा, जिससे देश का ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit) और चौड़ा हो सकता है। दिसंबर 2025 में यह डेफिसिट बढ़कर 25.04 अरब डॉलर तक पहुंच गया था, जो 1980 के बाद से एक लगातार बनी हुई समस्या है।
जियो-पॉलिटिकल अनिश्चितताएं और कच्चे तेल का खेल
वैश्विक स्तर पर बढ़ती भू-राजनीतिक अशांति (Geopolitical Unrest) उभरते बाजारों की करेंसी के लिए एक बड़ा जोखिम बनी हुई है, और रुपया भी इससे अछूता नहीं है। मौजूदा तनाव की स्थिति निवेशकों को डॉलर जैसी सुरक्षित संपत्तियों (Safe-haven Assets) की ओर धकेल रही है। इसके साथ ही, कच्चे तेल (Crude Oil) की ऊंची कीमतें भी भारतीय रुपये पर दबाव डाल रही हैं। 11 फरवरी 2026 को ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) का भाव करीब 69-70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना हुआ था। भारत एक बड़ा तेल आयातक देश होने के नाते, इन कीमतों में उतार-चढ़ाव से सीधे प्रभावित होता है, जिससे इंपोर्ट कॉस्ट (Import Cost) बढ़ जाती है और डॉलर की मांग तेज हो जाती है।
IT सेक्टर की कमजोरी और कैपिटल फ्लोज़ (Capital Flows)
भारत के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले IT सेक्टर का प्रदर्शन भी चिंता का विषय है। वैश्विक मांग में आई कमी के कारण, भारतीय IT कंपनियां धीमी ग्रोथ का सामना कर रही हैं। विश्लेषकों का अनुमान है कि रेवेन्यू (Revenue) ग्रोथ में लगातार आठवां तिमाही सिंगल-डिजिट में रह सकता है। अमेरिका और यूरोप जैसे प्रमुख बाजारों में क्लाइंट्स (Clients) की तरफ से खर्च में की जा रही कटौती और प्रोजेक्ट्स (Projects) में देरी इसकी मुख्य वजहें हैं। यह कमजोरी भारत के महत्वपूर्ण IT एक्सपोर्ट रेवेन्यू (Export Revenue) को प्रभावित कर रही है, जो विदेशी मुद्रा का एक अहम जरिया है। हालांकि, फरवरी की शुरुआत में एफपीआई (FPIs) ने 8,100 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश करके भारतीय बाजारों में वापसी की है, जो जनवरी के आउटफ्लो (Outflow) के बाद एक सकारात्मक संकेत है। फिर भी, एक्सपोर्ट आय में यह अंतर्निहित कमजोरी और वैश्विक निवेशकों की जोखिम से बचने की प्रवृत्ति (Risk Aversion) को देखते हुए, ऐसे फ्लोज़ (Flows) अस्थिर रह सकते हैं।
आगे की राह और एक्सपर्ट्स की राय
इन सब चुनौतियों के बावजूद, कुछ विश्लेषक आशावादी बने हुए हैं। गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) ने भारत की ग्रोथ (Growth) के अनुमान को बढ़ाया है और ट्रेड डील के बाद करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) के अनुमान को कम किया है। हालांकि, उनका मानना है कि मौजूदा स्तर से रुपये में बहुत ज्यादा मजबूती की उम्मीद कम है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने अपनी पॉलिसी रेपो रेट (Repo Rate) को 5.25% पर स्थिर रखा है, जो स्थिरता का संकेत देता है, लेकिन बाजार आने वाले समय में मौद्रिक नीति (Monetary Policy) को लेकर स्पष्टता का इंतजार कर रहा है। 11 फरवरी 2026 को, शेयर बाजार का मुख्य सूचकांक सेंसेक्स (Sensex) 84,233.64 और निफ्टी (Nifty) 25,953.85 के स्तर पर लगभग सपाट बंद हुए, जो बाजार की मिली-जुली भावनाओं को दर्शाता है। हाल के वर्षों में, विशेष रूप से 2025 में, रुपये में डॉलर के मुकाबले लगभग 7% की गिरावट देखी गई है, जो बाहरी मौद्रिक नीति और वैश्विक जोखिम सेंटिमेंट (Risk Sentiment) के प्रति इसकी संवेदनशीलता को उजागर करता है। विश्लेषक 2026 के मध्य तक USD/INR को 90-93 के दायरे में रहने का अनुमान लगा रहे हैं, जो इन निरंतर दबावों को दर्शाता है।