यह सब शुरू हुआ 3 फरवरी 2026 को, जब भारत और अमेरिका के बीच एक बड़े ट्रेड एग्रीमेंट (Trade Agreement) का ऐलान हुआ। इस डील के तहत, अमेरिका ने भारतीय सामानों पर अपने टैरिफ (Tariff) को 50% से घटाकर 18% कर दिया। इसका सीधा असर भारतीय रुपये पर दिखा, जिसने तीन हफ़्ते की ऊंचाई छू ली और यह उस दिन की सबसे बड़ी सिंगल-डे गेन (Single-day Gain) बन गई, जो दिसंबर 2018 के बाद देखी गई थी। 4 फरवरी 2026 को USD/INR स्पॉट रेट लगभग 90.2680 पर बंद हुआ, जो जनवरी 2026 के निचले स्तर 92 से एक महत्वपूर्ण रिकवरी है।
बाजार में इस खबर से 'रिस्क-ऑन' सेंटीमेंट (Risk-on Sentiment) बढ़ा और एक्सपोर्टर्स (Exporters) ने डॉलर बेचना शुरू कर दिया। इस सकारात्मक माहौल का असर भारतीय इक्विटी बेंचमार्क (Equity Benchmarks) पर भी दिखा, जहां सेंसेक्स (Sensex) और निफ्टी (Nifty) दोनों में 3 फरवरी 2026 को लगभग 2.5% की बढ़ोतरी हुई।
हालांकि, ट्रेड डील से भारतीय एक्सपोर्ट्स, खासकर टेक्सटाइल, जेम्स और फार्मा को फायदा होगा, लेकिन रुपये की इस तेज़ी की टिकाऊपन पर सवाल उठ रहे हैं। विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) इस डील से पहले मिले-जुले संकेत दे रहे थे। 29 जनवरी 2026 को वे इक्विटी में लगभग 394 करोड़ रुपये के नेट सेलर थे, लेकिन 3 फरवरी 2026 तक फरवरी 2026 के लिए FPI नेट इन्वेस्टमेंट इक्विटी में 788 करोड़ रुपये के पार सकारात्मक हो गया। मगर, बड़े पैमाने पर विदेशी पूंजी की लगातार वापसी रुपये की मीडियम-टर्म (Medium-term) चाल के लिए बेहद अहम होगी।
MUFG के एनालिस्ट्स (Analysts) का 2026 के लिए रुपये पर नेगेटिव आउटलुक (Negative Outlook) है। वे फिस्कल कंसॉलिडेशन (Fiscal Consolidation) और बोर्रोविंग रिक्वायरमेंट्स (Borrowing Requirements) को लेकर चिंतित हैं। वहीं, यूएस डॉलर इंडेक्स (DXY), जो डॉलर को अन्य प्रमुख करेंसी के मुकाबले ट्रैक करता है, में भी 97.4143 के आसपास दबाव दिख रहा है (4 फरवरी 2026 को)। इससे पहले जनवरी में यह लगभग चार साल के निचले स्तर 95.5 पर भी गया था। डॉलर की यह कमजोरी इमर्जिंग मार्केट करेंसीज़ (Emerging Market Currencies) को कुछ सहारा दे सकती है, लेकिन रुपये की अपनी परफॉरमेंस (Performance) डोमेस्टिक फैक्टर्स (Domestic Factors) से प्रभावित होगी।
कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव भी एक बड़ी चुनौती है, जो भारत के इम्पोर्ट बिल (Import Bill) और ट्रेड बैलेंस (Trade Balance) पर असर डालता है। 4 फरवरी 2026 को ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) लगभग $67.78 प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा था, और मध्य पूर्व में जियोपॉलिटिकल टेंशन (Geopolitical Tensions) के कारण कीमतों में और बढ़ोतरी का खतरा बना हुआ है। बढ़ता तेल दाम आम तौर पर रुपये पर दबाव डालता है।
एनालिस्ट्स की राय बंटी हुई है। HSBC के एनालिस्ट्स (Analysts) का मानना है कि रुपया 'थोड़ा अंडरवैल्यूड' (Slightly Undervalued) है और मार्च 2026 तक 88 प्रति डॉलर तक जा सकता है। वहीं, Barclays के इकोनॉमिस्ट्स (Economists) आगाह करते हैं कि मंगलवार की बढ़त टिक नहीं सकती। कुछ का अनुमान है कि USD/INR मई 2026 तक 94 तक पहुंच सकता है।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) भी मौजूदा रुपये की स्ट्रेंथ (Strength) का इस्तेमाल अपने फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व (Foreign Exchange Reserves) को बढ़ाने के लिए कर सकता है, जिससे भविष्य में करेंसी मूवमेंट पर असर पड़ सकता है। ट्रेड डील से भारत की एक्सपोर्ट कम्पेटिटिवनेस (Export Competitiveness) और जीडीपी ग्रोथ (GDP Growth) को फायदा होने की उम्मीद है, गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) ने 2026 के लिए अपना अनुमान 6.9% कर दिया है। लेकिन, रुपये का आगे का रास्ता अभी साफ नहीं है। बाजार डील के इम्प्लीमेंटेशन डिटेल्स (Implementation Details) और ग्लोबल इकोनॉमिक अनसर्टेनिटीज़ (Global Economic Uncertainties) के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करेगा।