स्थिरता का भ्रम?
हाल ही में रुपये में 0.9% की तेजी देखी गई, जिससे यह 94.94 पर बंद हुआ। यह फरवरी से चली आ रही भारी गिरावट से एक राहत की सांस है। हालांकि, यह उछाल किसी बड़े बदलाव का संकेत कम, और ओवरसोल्ड स्तरों से एक तकनीकी वापसी ज्यादा लगता है। ऐसे में अगर ग्लोबल लिक्विडिटी टाइट हो रही हो तो कैपिटल इनफ्लो (Capital Inflow) बनाए रखना कितना मुश्किल होगा, इस पर ध्यान देना ज़रूरी है।
RBI के दांव और अमेरिकी ब्याज दरें
भले ही RBI ने विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए रेगुलेटरी एडजस्टमेंट (Regulatory Adjustment) किए हों, लेकिन अमेरिकी ब्याज दरों का असर साफ दिख रहा है। अमेरिका में लगातार बढ़ती महंगाई (Inflation) के चलते वहां के एसेट्स (Assets) की मांग बढ़ रही है, जो कि रुपये पर एक ऊपरी सीमा लगा रही है। पिछली बार की तरह इस बार डोमेस्टिक डिमांड (Domestic Demand) बाहरी दबाव को झेलने के लिए काफी नहीं है, और 'सेफ्टी' की ओर भागना जारी है।
क्यों है रुपये पर दबाव?
अन्य उभरते बाजारों (Emerging Markets) की तुलना में, भारत ने आक्रामक रेट हाइक (Rate Hike) से बचते हुए ग्रोथ (Growth) और करेंसी डिफेंस (Currency Defense) के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है। लेकिन इसी वजह से रुपया अचानक लिक्विडिटी आउटफ्लो (Liquidity Outflow) के प्रति संवेदनशील बना हुआ है।
मंदी की आशंकाएं
कैपिटल इनफ्लो को लेकर उम्मीदें कई बड़ी रुकावटों का सामना कर रही हैं। ब्याज दर के अंतर के अलावा, घरेलू अर्थव्यवस्था पर कमजोर मॉनसून का खतरा मंडरा रहा है। मॉनसून की मार ऐतिहासिक रूप से खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ाकर और ग्रामीण खपत को कम करके रुपये पर दबाव डालती है। इसके अलावा, फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट (Foreign Portfolio Investment) पर निर्भरता इसे और खतरनाक बनाती है। अगर AI-ड्रिवेन मार्केट बबल (AI-driven Market Bubble) में कोई बड़ी गिरावट आती है, तो ग्लोबल रिस्क एवर्जन (Global Risk Aversion) के चलते कैपिटल की वापसी तेज हो सकती है। प्राइवेट क्रेडिट मार्केट (Private Credit Market) पर भी नजर रखनी होगी, क्योंकि कोई भी स्थानीय दबाव निवेशक के भरोसे को कम कर सकता है।
आगे की रणनीति
सितंबर के बाद के तिमाही का अनुमान लगाने के लिए ट्रेड डायनामिक्स (Trade Dynamics) पर ध्यान देना होगा। साल के आखिरी तिमाही की ओर बढ़ते हुए, रुपये की कमजोरी की जो ऐतिहासिक प्रवृत्ति है, वह शायद कम हो जाए और साल की शुरुआत से हुई कुछ हानियों को सुधारा जा सके। हालांकि, यह तभी संभव है जब पश्चिम एशिया (West Asia) में बाहरी भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Tension) और न बढ़े। बड़े इंस्टीट्यूशनल पार्टिसिपेंट्स (Institutional Participants) फिलहाल रुपये की दिशा तय करने से पहले अमेरिकी महंगाई के आंकड़ों में स्पष्ट ब्रेक का इंतजार कर रहे हैं।
