Indian Rupee Record Low: तेल के झटके से रुपया ऐतिहासिक निचले स्तर पर, RBI की चुनौती

ECONOMY
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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Indian Rupee Record Low: तेल के झटके से रुपया ऐतिहासिक निचले स्तर पर, RBI की चुनौती
Overview

मिडिल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव (geopolitical tensions) और कच्चे तेल की कीमतों में आई तूफानी तेजी के कारण भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने ऐतिहासिक निचले स्तर पर आ गया है। डॉलर के मुकाबले रुपया **91.9** के करीब ट्रेड कर रहा है।

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तेल के झटके से रुपया लुढ़का

मिडिल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और सप्लाई में संभावित रुकावटों के डर से कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल आया है। इसका सीधा असर भारतीय रुपये पर देखने को मिला है, जो अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गया है। शुरुआती मार्च 2026 में रुपया 92.33 के स्तर को पार कर गया। ब्रेंट क्रूड (Brent crude) की कीमतें $118 प्रति बैरल के करीब पहुंच गई हैं, जिससे भारत की आयत (import) पर निर्भरता और भी ज्यादा उजागर हो गई है। यह स्थिति भारत के करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) को बढ़ा रही है। Q3 FY2026 में CAD $13.2 बिलियन (GDP का 1.3%) तक पहुंच गया था। अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि तेल की कीमत में $10 की हर बढ़त CAD को 30-40 बेसिस पॉइंट तक बढ़ा सकती है। 9 मार्च 2026 को USD/INR की जोड़ी 92.4250 पर ट्रेड कर रही थी, जो पिछले सत्र से 0.53% अधिक थी और पिछले 12 महीनों में 5.84% की गिरावट दर्शाती है। विश्लेषकों का अनुमान है कि आने वाले समय में रुपया 91-93 के बीच रह सकता है, और तनाव जारी रहने पर 95 या उससे ऊपर भी जा सकता है।

भारत की कमजोरी: आयात पर भारी निर्भरता

भारत अपनी लगभग 89% कच्चे तेल की जरूरतें आयात (import) करता है। यह भारी निर्भरता भारत की अर्थव्यवस्था को ग्लोबल कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रति बेहद संवेदनशील बनाती है। इसका सीधा असर ट्रेड बैलेंस, महंगाई (inflation) और फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व पर पड़ता है। इस माहौल में फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) उभरते बाजारों (emerging markets) से पैसा निकालना शुरू कर रहे हैं, खासकर उन बाजारों से जो बाहरी झटकों के प्रति संवेदनशील माने जाते हैं। महंगाई, CAD और करेंसी की अस्थिरता को लेकर चिंताओं के चलते हाल के महीनों में FPIs का भारी मात्रा में पैसा बाहर गया है।

RBI की रणनीति और रिजर्व की भूमिका

इन सब दबावों के बावजूद, भारत का फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व 27 फरवरी 2026 तक रिकॉर्ड $728.49 बिलियन पर पहुंच गया है। यह रिजर्व RBI को करेंसी की अत्यधिक अस्थिरता को मैनेज करने और आयात के लिए भुगतान करने में मदद कर रहा है। हालांकि, RBI की नीति का मुख्य उद्देश्य अस्थिरता को रोकना है, न कि किसी विशेष एक्सचेंज रेट का बचाव करना। विश्लेषकों का कहना है कि RBI की आक्रामक दखलंदाजी की क्षमता बाहरी झटकों के कारण सीमित है और यह घरेलू संकटों की तुलना में कम प्रभावी हो सकती है।

आगे का रास्ता?

भविष्य में रुपये की चाल भू-राजनीतिक तनाव के कम होने और ग्लोबल तेल कीमतों में स्थिरता पर निर्भर करेगी। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि 2026 के अंत तक रुपया 87.00 तक मजबूत हो सकता है, वहीं कुछ का अनुमान है कि यह 93.21 तक कमजोर हो सकता है। हालांकि, तत्काल भविष्य में रुपये में उतार-चढ़ाव जारी रहने की उम्मीद है, जो मिडिल ईस्ट की भू-राजनीतिक स्थिति और कच्चे तेल की सप्लाई पर निर्भर करेगा।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.