भारतीय रुपये (Indian Rupee) ने इस हफ्ते डॉलर के मुकाबले अपनी सबसे बड़ी साप्ताहिक गिरावट दर्ज की है। शुक्रवार को यह **96.28** प्रति डॉलर के स्तर पर बंद हुआ। इस गिरावट की मुख्य वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent Crude Oil) की कीमतों में **13%** का जबरदस्त उछाल है, जो अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण आई है।
तेल की कीमतों का झटकेदार असर
मध्य-पूर्व में जारी भू-राजनीतिक तनाव के चलते ऊर्जा आपूर्ति मार्ग बाधित हो गए हैं, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य से। भारत अपनी जरूरत का ज़्यादातर तेल आयात (Import) करता है। ऐसे में, जब तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो भारत को भुगतान के लिए अमेरिकी डॉलर (US Dollar) की मांग भी बढ़ जाती है। इससे कंपनियों को बाजार से ज्यादा डॉलर खरीदने पड़ते हैं, जिसके चलते रुपया कमजोर हो जाता है। शुक्रवार को ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स $85.7 प्रति बैरल के करीब कारोबार कर रहे थे, जिससे रुपये पर दबाव बना हुआ है।
बाजार की चाल और RBI की भूमिका
रुपये में गिरावट के बावजूद, सरकारी बैंकों द्वारा किए गए बाजार हस्तक्षेप (Market Interventions) से इसे कुछ सहारा मिला। वित्तीय बाजार के जानकारों का मानना है कि ये कदम भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से अत्यधिक अस्थिरता को रोकने के लिए उठाए गए थे। हालांकि, तेल आयातकों की लगातार डॉलर खरीदने की होड़ ने इस समर्थन को चुनौती दी है। दूसरी ओर, निर्यातकों (Exporters) की ओर से रुपये में और गिरावट का इंतजार करते हुए बिकवाली रोके जाने की खबरें हैं।
वैश्विक इक्विटी से अलग चाल
जहां एक ओर रुपया संघर्ष कर रहा है, वहीं भारतीय शेयर बाजार (Equity Markets) ने अपने क्षेत्रीय साथियों की तुलना में आश्चर्यजनक स्थिरता दिखाई है। शुक्रवार को Nifty 50 इंडेक्स में 1% की बढ़त देखी गई, जबकि MSCI एशिया-पैसिफिक इंडेक्स (जापान को छोड़कर) 3% लुढ़क गया। यह मजबूती काफी हद तक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़ी चिपमेकर कंपनियों की वैश्विक बिकवाली में भारत की कम हिस्सेदारी के कारण है, जिसने दूसरे बाजारों पर दबाव डाला है।
फॉरवर्ड देनदारियां और भविष्य का अनुमान
निवेशक अब इस बात पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं कि केंद्रीय बैंक रुपये की रक्षा करने और अपने भंडार (Reserves) का प्रबंधन करने की दोहरी चुनौती से कैसे निपटेगा। मई तक, RBI की नेट फॉरवर्ड डॉलर देनदारियां $106.6 बिलियन थीं। केंद्रीय बैंक के सामने स्पॉट मार्केट में हस्तक्षेप करने और विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) को खत्म किए बिना संतुलन बनाने की कठिन चुनौती है। सबसे महत्वपूर्ण बात तेल की कीमतों की दिशा होगी; यदि वे बढ़ती रहती हैं, तो RBI को अपनी मुद्रा प्रबंधन (Currency Management) में और आक्रामक कदम उठाने पड़ सकते हैं। इसके अलावा, ट्रेडर्स इस बात पर भी नजर रखेंगे कि क्या रुपया 97-प्रति-डॉलर के स्तर को पार करता है, एक ऐसा स्तर जिसने ऐतिहासिक रूप से नीति निर्माताओं का काफी ध्यान खींचा है।
