भारतीय रुपया सोमवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 2 महीने के निचले स्तर पर आ गया। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी ने रुपये पर दबाव बनाया। रिपोर्टों के अनुसार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने रुपये को स्थिर करने के लिए डॉलर की बिकवाली की।
रुपये में आई गिरावट
सोमवार को कारोबारी सत्र के अंत में भारतीय रुपया 0.2% की गिरावट के साथ 96.45 प्रति डॉलर पर बंद हुआ। दिन के दौरान, रुपया 96.53 के निचले स्तर तक चला गया था, जो मई के मध्य के बाद का सबसे निचला स्तर था।
कच्चे तेल का असर
इस गिरावट का मुख्य कारण पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के चलते कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी रही। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा तेल आयात करता है, इसलिए जब कच्चे तेल के दाम बढ़ते हैं, तो तेल कंपनियों को डॉलर की मांग बढ़ जाती है, जिससे रुपये पर दबाव बनता है। सोमवार को ब्रेंट क्रूड $90 प्रति बैरल के पार चला गया था, जिसके चलते ट्रेडर्स ने रुपये की बिकवाली की।
RBI की भूमिका
बाजार के जानकारों का मानना है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोकने के लिए हस्तक्षेप किया। डीलरों ने सरकारी बैंकों द्वारा डॉलर बेचे जाने की बात कही, जो कि मुद्रा के तेजी से अवमूल्यन को रोकने के लिए केंद्रीय बैंक द्वारा अपनाया जाने वाला एक सामान्य तरीका है। तेल की कीमतों में थोड़ी नरमी आने के बाद रुपये को कुछ हद तक सहारा मिला।
जुलाई में लगातार दबाव
हालांकि, जुलाई के महीने में रुपया लगातार दबाव में रहा है और इस महीने में अब तक 1.85% की गिरावट दर्ज कर चुका है। फरवरी के अंत में पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू होने के बाद से, भारतीय मुद्रा 5.67% कमजोर हुई है।
विदेशी मुद्रा इनफ्लो का सीमित असर
बाजार विश्लेषकों का कहना है कि कुछ विशेष योजनाओं के तहत विदेशी मुद्रा में $20.72 बिलियन का इनफ्लो (17 जुलाई तक) हुआ है, लेकिन इसका रुपये को सहारा देने पर सीमित प्रभाव पड़ा है। इसका एक कारण RBI की अपनी फॉरवर्ड बुक को लेकर रणनीति भी है। जब विदेशी मुद्रा आती है, तो केंद्रीय बैंक अक्सर उसे रिजर्व बनाने या अपने बकाया फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स को कम करने के लिए इस्तेमाल करता है, बजाय इसके कि वह रुपये को मजबूत होने दे। नतीजतन, रुपया वैश्विक आपूर्ति चिंताओं और भू-राजनीतिक खबरों के प्रति संवेदनशील बना हुआ है।
अब निवेशकों की नजर कच्चे तेल की कीमतों पर और केंद्रीय बैंक के अगले कदमों पर रहेगी, क्योंकि ऊर्जा की कीमतों में अस्थिरता सीधे भारत के आयात बिल, महंगाई और रुपये की मजबूती को प्रभावित करती है।
