पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कम होने के संकेतों और कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में नरमी आने के चलते आज भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले मजबूत हुआ। अमेरिकी राष्ट्रपति की ईरान से जुड़ी बातचीत में प्रगति के संकेतों के बाद, कच्चे तेल की कीमतें $108.42 प्रति बैरल के अपने उच्च स्तर से नीचे आ गईं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के ईरान वार्ता में प्रगति के संकेत देने के बाद, पश्चिम एशिया में तनाव कम हुआ। इससे शिपिंग मार्गों को सुरक्षित करने के लक्ष्य वाले "प्रोजेक्ट फ्रीडम" को भी रोक दिया गया। भू-राजनीतिक तनाव में इस कमी से आपूर्ति संबंधी चिंताओं को दूर करने में मदद मिली, जिससे डॉलर इंडेक्स में 0.16% की गिरावट आई और यह लगभग 98.28 पर आ गया। इस सकारात्मक माहौल ने अन्य एशियाई मुद्राओं को भी डॉलर के मुकाबले मजबूत होने में मदद की।
रुपए की सुबह की इस तेजी के साथ ही जापानी येन और दक्षिण कोरियाई वॉन जैसी अन्य एशियाई मुद्राओं में भी मजबूती देखी गई, जो यह दर्शाता है कि यह डॉलर की कमजोरी का असर है, न कि केवल रुपए की अपनी ताकत। हालांकि, ब्रेंट क्रूड फिलहाल $108.50 के आसपास कारोबार कर रहा है, जो इस साल के औसत से ऊपर है, लेकिन भू-राजनीतिक डर से तत्काल राहत मिली है। ऐतिहासिक रूप से, पश्चिम एशिया में तनाव कम होने से रुपए में मजबूती आती है और तेल की कीमतों में गिरावट देखी जाती है।
यह सकारात्मक बाज़ार प्रतिक्रिया ऐसे समय में आ रही है जब विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) लगातार बिकवाली कर रहे हैं। मंगलवार को ही इन निवेशकों ने इक्विटी में लगभग ₹3,621.58 करोड़ की बिकवाली की। यह लगातार बिकवाली घरेलू बाज़ार में आई तेजी की स्थिरता पर चिंता पैदा करती है। तेल की कीमतों और रुपए के बीच मजबूत संबंध को देखते हुए, कच्चे तेल में निरंतर गिरावट आयातित महंगाई को कम करने में मदद करती है, जिससे रुपए को समर्थन मिलता है।
भू-राजनीतिक तनाव कम होने के बावजूद, बाज़ार में महत्वपूर्ण चुनौतियां बनी हुई हैं, खासकर FII की भारी बिकवाली। विदेशी निवेशकों की यह निरंतर बिकवाली घरेलू मूल्यांकन में विश्वास की कमी या उभरते बाजारों से वैश्विक पूंजी के पुनः आवंटन का संकेत दे सकती है। यह बिकवाली रुपए की बढ़त को कमजोर कर सकती है और शेयर बाज़ार की गति को धीमा कर सकती है, जैसा कि मंगलवार को रुपए के इंट्राडे में गिरावट देखने पर हुआ था, जिसे हस्तक्षेप से रोका गया।
इसके अलावा, पश्चिम एशिया की स्थिति अभी भी अस्थिर बनी हुई है। क्षेत्रीय तनाव में किसी भी तरह की वृद्धि या बातचीत टूटने की स्थिति में वर्तमान धारणा तेजी से उलट सकती है, जिससे तेल की कीमतों में उछाल आ सकता है और रुपए व आयातित महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है। "प्रोजेक्ट फ्रीडम" का निलंबन, हालांकि तत्काल आवागमन के डर को कम करता है, लेकिन वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण अंतर्निहित भू-राजनीतिक समस्याओं का समाधान नहीं करता है।
भारतीय रुपए का भविष्य तेल की कीमतों और FII के प्रवाह पर बहुत निर्भर रहेगा। विश्लेषकों का अनुमान है कि USD/INR जोड़ी 94.50 से 95.50 के दायरे में कारोबार कर सकती है, जिसमें भू-राजनीतिक उथल-पुथल या लगातार FII बिकवाली डॉलर के लिए जोखिम पैदा कर सकती है। बाज़ार की आम राय यही है कि ब्रेंट क्रूड की कीमतों में अस्थिरता बनी रहेगी, जो आपूर्ति-मांग असंतुलन और भू-राजनीतिक कारकों के कारण $100 प्रति बैरल से ऊपर बनी रह सकती है। भारतीय इक्विटी के लिए, FII की यह निरंतर बिकवाली Sensex और Nifty जैसे सूचकांकों की ऊपरी क्षमता को सीमित कर सकती है, भले ही वैश्विक भावना सकारात्मक बनी रहे।
