बाजार की रेस में रुपया: दांव पर स्थिरता?
बुधवार को भारतीय रुपये की चाल में एक नाजुक संतुलन देखने को मिला। एक तरफ जहां अमेरिकी डॉलर के कमजोर होने और शेयर बाज़ारों में आई तेजी ने रुपये को ऊपरी स्तरों पर सहारा दिया, वहीं दूसरी ओर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और विदेशी निवेशकों की निकासी ने इसके और मजबूत होने पर ब्रेक लगा दिया। यह स्थिति बताती है कि रुपया फिलहाल बाहरी दबावों के प्रति काफी संवेदनशील है।
क्या है रुपये की चाल के पीछे की वजह?
भारतीय रुपया आज 90.94 के स्तर पर खुला और दिन के कारोबार के अंत में 90.89 पर बंद हुआ, जिसमें 6 पैसे की मामूली बढ़त दर्ज की गई। डॉलर इंडेक्स में 0.07% की गिरावट आई, जो 97.77 पर पहुंच गया। इसी बीच, भारतीय शेयर बाज़ारों में जोरदार वापसी हुई। सेंसेक्स 558.79 अंक चढ़कर 82,784.71 पर और निफ्टी 157.05 अंक बढ़कर 25,581.70 पर बंद हुआ। इससे निवेशकों का भरोसा बढ़ा और पूंजी प्रवाह की उम्मीद जगी।
हालांकि, इन सकारात्मक संकेतों पर दो बड़े झटकों का असर पड़ा। कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आया, Brent क्रूड 1.37% बढ़कर $71.74 प्रति बैरल पर पहुंच गया। भारत एक बड़ा तेल आयातक देश है, ऐसे में तेल की ऊंची कीमतें सीधे तौर पर आयात बिल बढ़ाती हैं और व्यापार घाटे को चौड़ा करती हैं, जो आमतौर पर रुपये पर दबाव डालता है। इसके अलावा, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने मंगलवार, 24 फरवरी को ₹102.53 करोड़ की इक्विटी बेची, जिससे पूंजी की निकासी का संकेत मिला और रुपये की मजबूती पर अंकुश लगा।
मैक्रोइकॉनॉमिक फैक्टर का खेल
भारतीय रुपये के लिए मौजूदा बाजार का माहौल डॉलर की वैश्विक चाल, कमोडिटी की कीमतों में उतार-चढ़ाव और निवेशक भावनाओं का एक जटिल मिश्रण है। डॉलर इंडेक्स में आई कमजोरी अस्थायी लग रही है, जो रुपये को केवल डॉलर के अवमूल्यन से मिलने वाले लाभ की गुंजाइश को सीमित करती है। वहीं, भू-राजनीतिक तनावों, विशेष रूप से अमेरिका और ईरान के बीच, के कारण Brent क्रूड तेल की कीमतें ऊपर की ओर बढ़ रही हैं।
भारत का कच्चे तेल पर भारी आयात निर्भरता का मतलब है कि कीमतों में वृद्धि से सीधे तौर पर चालू खाता घाटा (CAD) बढ़ता है, जो ऐतिहासिक रूप से रुपये की गिरावट से मजबूती से जुड़ा हुआ है। हाल के आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2026 में भारत का मर्चेंडाइज व्यापार घाटा बढ़कर $34.68 बिलियन हो गया था, जिससे Q3 FY2026 में CAD के GDP का 2.3% रहने का अनुमान है।
विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) का प्रवाह मिला-जुला रहा है। फरवरी की शुरुआत में शुद्ध खरीदारी के दौर रहे, जिसमें 23 फरवरी को ₹3,843 करोड़ की खरीदारी भी शामिल है, लेकिन 24 फरवरी को ₹102.53 करोड़ की दैनिक निकासी ने अंतर्निहित सावधानी को उजागर किया। यह AI चिंताओं के कारण IT स्टॉक्स पर पड़ने वाले असर से भी जुड़ा है, जिससे FIIs ने टेक्नोलॉजी सेक्टर में बिकवाली की है। विश्लेषकों का अनुमान है कि रुपया 90.75-91.25 के दायरे में कारोबार कर सकता है।
भविष्य की राह: दबाव या स्थिरता?
विश्लेषक रुपये की दिशा को लेकर बंटे हुए हैं। कुछ का मानना है कि डॉलर की निरंतर मजबूती और निर्यात वृद्धि में संभावित नरमी के कारण दबाव बना रह सकता है। वहीं, कुछ विश्लेषक भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मुद्रा स्थिरता के प्रति प्रतिबद्धता और संभावित FDI प्रवाह को सकारात्मक कारक मानते हैं।
रुपये की चाल अमेरिकी व्यापार नीतियों, वैश्विक जोखिम की भावना और 91 के महत्वपूर्ण स्तर के आसपास RBI के प्रबंधन पर निर्भर करेगी। डॉलर इंडेक्स में स्थिरता या वृद्धि की संभावना रुपये के लिए मुश्किलें बढ़ा सकती है, खासकर अगर अमेरिकी मुद्रास्फीति के आंकड़े उम्मीद से ज्यादा आते हैं या फेडरल रिजर्व की नीति आक्रामक रहती है।