बुधवार को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले **16 पैसे** कमजोर होकर **96.32** पर बंद हुआ। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के चलते ग्लोबल क्रूड ऑयल की कीमतों में उछाल आया है, जिसका सीधा असर रुपये पर दिख रहा है। घरेलू शेयर बाजारों में मजबूती के बावजूद, बढ़ी हुई तेल आयात लागत और विदेशी फंड के आउटफ्लो (outflow) रुपये पर दबाव बनाए हुए हैं।
क्यों गिरा रुपया?
बुधवार को भारतीय शेयर बाजार में गिरावट का दौर देखने को मिला। रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 16 पैसे टूटकर ₹96.32 के स्तर पर आ गया। यह पिछले ट्रेडिंग सेशन में 48 पैसे की गिरावट के बाद का एक बड़ा ट्रेंड है। इस गिरावट की मुख्य वजह पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव है, जिसने ग्लोबल ऑयल सप्लाई को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। नतीजतन, कच्चे तेल की कीमतें बढ़कर $85.13 प्रति बैरल तक पहुँच गई हैं।
तेल की कीमतों का रुपये पर असर
भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए, कच्चे तेल के दाम बढ़ना एक बड़ी चुनौती है। दाम बढ़ने का मतलब है कि तेल कंपनियों को डॉलर की मांग बढ़ानी होगी, जिससे आयात बिल बढ़ेगा। इसी वजह से, रुपया मजबूत होने के सीमित अवसर ही मिलते हैं, भले ही डॉलर इंडेक्स (US Dollar Index) में नरमी दिख रही हो। बुधवार को डॉलर इंडेक्स 0.14% गिरकर 100.78 पर था, लेकिन यह ऊर्जा की कीमतों में आई इस तेजी के नकारात्मक प्रभाव को कम करने के लिए काफी नहीं था।
घरेलू बाजार और फंड फ्लो
हालांकि रुपया दबाव में था, लेकिन घरेलू इक्विटी बाजार (equity market) में मजबूती दिखी। सेंसेक्स 130.49 अंक और निफ्टी 26.45 अंक ऊपर बंद हुए। लेकिन, इक्विटी बाजार की यह मजबूती हमेशा करेंसी की मजबूती में तब्दील नहीं होती, खासकर तब जब फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (FIIs) बिकवाली कर रहे हों। मंगलवार के आंकड़ों के अनुसार, FIIs ने ₹739.69 करोड़ की इक्विटी बेची, जिससे रुपये पर बिकवाली का दबाव और बढ़ गया।
महंगाई और टैक्स कलेक्शन
इन बाहरी दबावों के अलावा, महंगाई पर भी नजर रखना जरूरी है। जून में होलसेल प्राइस इन्फ्लेशन (Wholesale Price Inflation) 9.87% पर पहुंच गया, जो मई के 9.68% से अधिक है। यह मुख्य रूप से भोजन और गैर-खाद्य वस्तुओं के महंगा होने से हुआ है। बढ़ती महंगाई मौद्रिक नीति को जटिल बना सकती है और लंबी अवधि में करेंसी की स्थिरता को प्रभावित कर सकती है। एक सकारात्मक बात यह है कि डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन (Direct Tax Collections) में 16.40% की ग्रोथ देखी गई है, जो 13 जुलाई तक ₹6.51 लाख करोड़ से अधिक रहा। यह अर्थव्यवस्था के लिए कुछ राजकोषीय समर्थन प्रदान करता है।
आगे क्या?
बाजार के लिए आगे सबसे बड़ा फैक्टर तेल की कीमतों में स्थिरता और पश्चिम एशिया में संघर्ष का घटनाक्रम होगा। ट्रेडर्स इस बात पर नजर रखेंगे कि रुपया अपनी मौजूदा रेंज बनाए रखता है या नहीं। अगर कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती रहती हैं, तो रुपये में और ज्यादा उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। आने वाले हफ्तों में करेंसी की दिशा समझने के लिए फॉरेन फंड इनफ्लो (foreign fund inflows) के रुझान और महंगाई पर केंद्रीय बैंक की टिप्पणी पर भी ध्यान देना महत्वपूर्ण होगा।
