अमेरिकी महंगाई दर में नरमी के संकेतों के बीच भारतीय रुपया आज डॉलर के मुकाबले मजबूत खुला है। यह मजबूती विदेशी बाजारों से मिले सकारात्मक संकेतों और फेडरल रिजर्व के रेट हाइक की आशंकाओं में कमी के कारण है, लेकिन कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें अभी भी रुपये के लिए एक बड़ा जोखिम बनी हुई हैं।
अमेरिकी महंगाई में गिरावट से राहत
अमेरिकी बाज़ार से आज राहत भरी ख़बर आई है। जून में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (Consumer Price Index) 3.5% रहा, जो पिछले महीने के 4.2% से काफी कम है। वहीं, कोर इन्फ्लेशन (Core Inflation) भी 2.9% से घटकर 2.6% पर आ गया है। इस गिरावट ने अमेरिकी फेडरल रिजर्व (Federal Reserve) के ब्याज दरों (Interest Rates) को लेकर बाजार की उम्मीदों को काफी कम कर दिया है। अब जुलाई में रेट हाइक की संभावना 40% से घटकर मात्र 12% रह गई है। कम ब्याज दरों का मतलब है कि डॉलर पर दबाव बढ़ेगा, जिससे रुपये जैसी उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं को कुछ राहत मिलती है।
कच्चे तेल का बढ़ता खतरा
हालांकि, रुपये के लिए एक बड़ी चिंता कच्चे तेल (Crude Oil) की बढ़ती कीमतें हैं। ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) फिलहाल $86 प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Tensions) इस तेजी का मुख्य कारण बताया जा रहा है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा तेल आयात (Oil Import) करता है, ऐसे में तेल की बढ़ती कीमतें सीधे तौर पर देश के इंपोर्ट बिल को बढ़ाती हैं। ऑयल मार्केटिंग कंपनियां आयात का भुगतान करने के लिए डॉलर खरीदती हैं, जिससे रुपये पर दबाव बनता है और उसकी मजबूती सीमित हो जाती है।
टेक्निकल लेवल्स पर नजर
बाजार विश्लेषकों की नजर अब रुपये के टेक्निकल लेवल्स पर भी है। CR Forex Advisors के अनुसार, रुपया हाल ही में 95.80 से 96.00 के लेवल को पार कर चुका है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या रुपया इस स्तर को बनाए रख पाता है या नहीं, क्योंकि यह आने वाले दिनों में रुपये की दिशा तय करेगा।
कुल मिलाकर, निवेशकों की नजरें कच्चे तेल की कीमतों और फेडरल रिजर्व की आगे की रणनीति पर बनी रहेंगी। किसी भी अप्रत्याशित भू-राजनीतिक घटना या महंगाई के ट्रेंड में बदलाव से रुपये की चाल पर असर पड़ सकता है।
