भारतीय रुपया धड़ाम! ईरान-अमेरिका तनातनी से तेल सप्लाई का डर, शेयर बाजार में स्थिरता

ECONOMY
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AuthorMehul Desai|Published at:
भारतीय रुपया धड़ाम! ईरान-अमेरिका तनातनी से तेल सप्लाई का डर, शेयर बाजार में स्थिरता
Overview

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर चिंताओं के चलते सोमवार को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले **19 पैसे** कमजोर होकर **93.10** के स्तर पर बंद हुआ। हालांकि, इन भू-राजनीतिक चिंताओं के बावजूद, भारतीय शेयर बाजार (Equity Markets) में स्थिरता देखी गई और सेंसेक्स व निफ्टी मामूली बढ़त के साथ बंद हुए।

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पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच छिड़ी तनातनी ने भारतीय रुपये पर भारी दबाव बना दिया है। सोमवार को रुपये में गिरावट मुख्य रूप से इसी तनाव और उसके चलते कच्चे तेल (Crude Oil) की सप्लाई पर पड़ सकने वाले असर की आशंकाओं के चलते आई।

रुपया दिन के कारोबार में 92.73 पर खुला था, लेकिन बाद में यह 93.24 के निचले स्तर तक चला गया और अंत में 93.10 के स्तर पर बंद हुआ। डॉलर इंडेक्स, जो छह प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले अमेरिकी डॉलर की ताकत को मापता है, 0.14% बढ़कर 98.03 पर पहुंच गया।

ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ने से होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे महत्वपूर्ण शिपिंग मार्गों पर संभावित व्यवधान का डर बढ़ गया है। यह इलाका वैश्विक तेल व्यापार के लिए बहुत अहम है।

मिराए एसेट शेयरखान (Mirae Asset ShareKhan) के रिसर्च एनालिस्ट अनुज चौधरी के मुताबिक, डॉलर की मजबूती और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव रुपये के कमजोर होने के पीछे प्रमुख कारण हैं। उन्होंने उम्मीद जताई है कि डॉलर-रुपया (USD-INR) इस हफ्ते 93 से 93.60 के बीच रह सकता है, जिसमें गिरावट का रुख बना रहेगा। अन्य विश्लेषक भी इस हफ्ते डॉलर-रुपया के 92.80 से 93.70 के दायरे में रहने की संभावना जता रहे हैं।

इसके विपरीत, भारतीय शेयर बाजारों ने गजब का लचीलापन दिखाया। बीएसई सेंसेक्स 0.03% की मामूली बढ़त के साथ बंद हुआ, जबकि एनएसई निफ्टी 0.05% ऊपर रहा। अंतरराष्ट्रीय तनाव के बावजूद इस स्थिरता से पता चलता है कि घरेलू मांग और कंपनियों के मजबूत नतीजे (Corporate Earnings) बाजार को बाहरी झटकों से बचा रहे हैं। विदेशी निवेशकों (Foreign Investors) ने शुक्रवार को ₹683.20 करोड़ के शुद्ध निवेश से भी बाजार में जारी भरोसे को दर्शाया।

हालांकि, रुपये में मामूली गिरावट और स्थिर इक्विटी के बावजूद, कुछ बड़े जोखिम अभी भी बने हुए हैं। भारत कच्चे तेल का एक बड़ा आयातक (Importer) है, इसलिए भू-राजनीतिक व्यवधानों से कीमतों में बढ़ोतरी के प्रति वह काफी संवेदनशील है। होर्मुज जलडमरूमध्य को खतरा भारत के व्यापार और चालू खाते के घाटे (Current Account Deficit) को बढ़ा सकता है। अनुमान है कि कच्चे तेल की कीमतों में $10 प्रति बैरल की बढ़ोतरी से यह घाटा जीडीपी का 0.5% तक बढ़ सकता है। इससे महंगाई बढ़ सकती है और भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India) को ऐसी नीतियां अपनाने पर मजबूर होना पड़ सकता है जो आर्थिक विकास को धीमा कर दें।

डॉलर-रुपया की चाल पश्चिम एशिया में उभरती स्थिति और वैश्विक तेल बाजारों पर इसके प्रभाव पर निर्भर करेगी। विश्लेषकों को उम्मीद है कि रुपया दबाव में बना रहेगा, लेकिन तनाव कम होने की स्थिति में इसे सहारा मिल सकता है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.