यह बड़ा फैसला ऐसे समय में आया है जब निर्यातकों को कई मोर्चों पर मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। एक तरफ जहाँ RoDTEP दरों की पूरी बहाली उन्हें थोड़ी राहत दे सकती है, वहीं दूसरी तरफ बढ़ते बाहरी दबावों और वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी के बीच सरकार की निर्भरता बढ़ रही है।
RoDTEP में वापसी और फिस्कल टाइटनिंग
डायरेक्टरेट जनरल ऑफ फॉरेन ट्रेड (DGFT) ने साफ किया है कि RoDTEP दरों में जो अस्थायी कटौती 23 फरवरी 2026 से लागू थी, उसे 1 अप्रैल 2026 से पूरी तरह वापस ले लिया जाएगा। इससे निर्यातकों को बड़ी राहत मिली है, जिन्होंने दरें कम होने पर चिंता जताई थी। RoDTEP स्कीम का मकसद निर्यात किए गए माल पर लगे उन घरेलू टैक्सों और ड्यूटीज को वापस करना है जो अन्यथा रिकवर नहीं हो पाते, ताकि भारतीय निर्यात ग्लोबल मार्केट में टैक्स-न्यूट्रल हो सकें।
हालांकि, इस बहाली का समय महत्वपूर्ण है, क्योंकि यूनियन बजट 2026-27 में इस स्कीम के लिए आवंटन में भारी 45% की कटौती की गई है। अब FY2026-27 के लिए RoDTEP का बजट ₹10,000 करोड़ कर दिया गया है, जबकि पिछले फाइनेंशियल ईयर में यह ₹18,233 करोड़ था। यह भारी बजट कटौती बताती है कि भले ही फायदे बहाल किए जा रहे हैं, लेकिन स्कीम के लिए कुल वित्तीय समर्थन काफी कम हो गया है।
भू-राजनीतिक लागतों का बढ़ता बोझ
RoDTEP फायदों की बहाली ऐसे वक्त में और भी जरूरी हो जाती है जब पश्चिम एशिया संकट के कारण लागतें आसमान छू रही हैं। हालिया भू-राजनीतिक तनावों ने शिपिंग रूट्स को बुरी तरह प्रभावित किया है, जिससे माल ढुलाई (freight) और समुद्री बीमा (marine insurance) प्रीमियम में जबरदस्त इजाफा हुआ है। अनुमान है कि बीमा प्रीमियम में कार्गो वैल्यू का 0.5% से 1.5% तक की बढ़ोतरी हुई है, जिससे लैंडेड कॉस्ट (landed cost) बढ़ गई है।
इसके अलावा, जहाजों को केप ऑफ गुड होप (Cape of Good Hope) से घुमाकर भेजने पर यूरोप और अमेरिका तक की यात्रा में 15 से 20 दिन ज्यादा लग रहे हैं। इन लॉजिस्टिकल दिक्कतों और कच्चे तेल की कीमतों में संभावित उछाल (ब्रेंट क्रूड $82-84 प्रति बैरल तक) से भारतीय सामानों की कीमत प्रतिस्पर्धा (price competitiveness) पर सीधा असर पड़ रहा है। कीमत-संवेदनशील (price-sensitive) सेक्टरों के लिए, लागत में 1-2% की छोटी सी बढ़ोतरी भी इंटरनेशनल ऑर्डर हासिल करने या गंवाने का फैसला कर सकती है। ऐसे में RoDTEP स्कीम के पूरे फायदे मिलना बहुत जरूरी है।
बदलते ग्लोबल ट्रेड के समीकरण और सेक्टरों की मुश्किलें
भारतीय निर्यातक सिर्फ क्षेत्रीय संघर्षों से ही नहीं, बल्कि ग्लोबल ट्रेड में आ रही मंदी से भी जूझ रहे हैं। ग्लोबल ट्रेड ग्रोथ के 2025 में काफी धीमी होकर लगभग 1.8% रहने का अनुमान है। इस मंदी के पीछे बढ़ता संरक्षणवाद (protectionism), अमेरिका जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं द्वारा टैरिफ बढ़ाना और लगातार बनी हुई पॉलिसी अनिश्चितता जैसे कारण हैं। उभरते बाजार (Emerging markets) और विकासशील अर्थव्यवस्थाएं इन चुनौतियों के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील हैं।
ऐसे माहौल में, जनवरी 2026 में भारत के मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट (merchandise exports) में मामूली 0.61% की बढ़ोतरी हुई, जो $36.56 बिलियन रहा। हालांकि, इससे ट्रेड डेफिसिट (trade deficit) बढ़कर $34.68 बिलियन हो गया। सर्विसेज एक्सपोर्ट (services exports) में अच्छी ग्रोथ देखी गई, लेकिन मर्चेंडाइज सेक्टर की परफॉरमेंस बाहरी लागतों के प्रति उसकी संवेदनशीलता को दर्शाती है। चीन और दक्षिण कोरिया जैसे प्रतिस्पर्धी देश बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और एफिशिएंसी का फायदा उठाते हैं। भारत की एक्सपोर्ट कॉम्पिटिटिवनेस फिलहाल काफी हद तक सर्विस-आधारित है, लेकिन प्रोडक्टिविटी गैप्स और कमजोर इंडस्ट्रियल डेप्थ (industrial depth) एक बड़ी चुनौती है।
निर्भरता और स्थिरता पर चिंताएं
RoDTEP फायदों की बहाली, भले ही यह तात्कालिक राहत दे, लेकिन यह सरकारी सहायता पर निर्भरता को भी उजागर करती है। FY27 के बजट में स्कीम के आवंटन में ₹18,233 करोड़ से घटाकर ₹10,000 करोड़ करना, राजकोषीय खर्चों को कम करने का स्पष्ट संकेत है। यह फिस्कल टाइटनिंग (fiscal tightening) ऐसे व्यापक निर्यात प्रोत्साहनों (export incentives) की लॉन्ग-टर्म सस्टेनेबिलिटी (long-term sustainability) पर सवाल खड़े करती है, खासकर जब ग्लोबल ट्रेड में लगातार उतार-चढ़ाव बना हुआ है।
विश्लेषकों का कहना है कि RoDTEP ने ग्रोथ उत्प्रेरक (growth catalyst) के बजाय एक स्टेबलाइजर (stabiliser) के तौर पर काम किया है। इसके अलावा, भले ही भारत के EU जैसे मजबूत ट्रेड पैक्ट्स हैं, लेकिन RoDTEP जैसी स्कीमों पर निर्भरता वैश्विक साथियों की तुलना में भारत की अंतर्निहित कॉम्पिटिटिवनेस गैप्स को छिपा सकती है। कीमत-संवेदनशील सेक्टरों के निर्यातकों को फिस्कल सपोर्ट में और कटौती होने पर भारी बोझ उठाना पड़ सकता है। भारत की मैन्युफैक्चरिंग कॉम्पिटिटिवनेस, PLI स्कीम्स जैसी पहलों के बावजूद, कम R&D निवेश और खंडित औद्योगिक आधार (fragmented industrial bases) जैसी समस्याओं के कारण प्रमुख एशियाई देशों से पिछड़ रही है।
आगे का रास्ता
1 अप्रैल 2026 से RoDTEP दरों की पूर्ण बहाली, मौजूदा लागत दबावों का सामना कर रहे भारतीय निर्यातकों के लिए एक अनुमानित ढांचा प्रदान करती है। हालांकि, यह नीतिगत निरंतरता राजकोषीय संयम (fiscal restraint) के माहौल में आई है, जैसा कि FY27 के लिए स्कीम के बजट आवंटन में हुई तेज कमी से पता चलता है। निर्यातक बढ़ती ग्लोबल शिपिंग और बीमा लागतों, धीमी मांग और बढ़ते संरक्षणवाद के माहौल का सामना कर रहे हैं। RoDTEP बहाली की प्रभावशीलता अंततः इन बढ़ती बाहरी दबावों को सीमित वित्तीय दायरे (constrained fiscal envelope) में संतुलित करने की इसकी क्षमता पर निर्भर करेगी। साथ ही, भारत की लॉन्ग-टर्म एक्सपोर्ट कॉम्पिटिटिवनेस, जो ऐसे वित्तीय उपायों से स्वतंत्र हो, नीति निर्माताओं और उद्योग जगत के लिए एक महत्वपूर्ण विचारणीय विषय बनी हुई है।