बढ़ती लागत से एक्सपोर्टर बेहाल
पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक उथल-पुथल भारत की ट्रेड फाइनेंस व्यवस्था की कमजोरियों को सामने ला रही है। लंबे शिपिंग रूट्स, जहाजों को रूट बदलना और सुरक्षा जोखिमों के कारण भारतीय निर्यातकों की वित्तीय सेहत और ऑपरेशंस पर गंभीर असर पड़ रहा है।
लाल सागर संकट सीधे तौर पर भारतीय निर्यातकों पर भारी आर्थिक बोझ डाल रहा है। फ्रेट चार्ज (freight charges) आसमान छू रहे हैं; मिसाल के तौर पर, कोलकाता से रॉटरडैम का रूट $500 से बढ़कर $4,000 तक पहुँच गया है। इसके अलावा, एक्सपोर्टर्स को पेमेंट में देरी होने पर स्टैंडर्ड एक्सपोर्ट क्रेडिट (export credit) पर 3-4% ज़्यादा पेनाल्टी इंटरेस्ट (penal interest) चुकाना पड़ सकता है। वे इंटरेस्ट इक्वलाइजेशन स्कीम (Interest Equalisation Scheme) के तहत मिलने वाली 2.75% की सब्सिडी (subsidy) भी खो सकते हैं। इससे एक्सपोर्ट क्रेडिट की प्रभावी लागत 5.75% से 6.75% तक बढ़ सकती है। शिपिंग का बढ़ता समय, जो अब 14-20 दिन हो गया है, वर्किंग कैपिटल (working capital) साइकिल पर दबाव डाल रहा है और फाइनेंसिंग की ज़रूरत को बढ़ा रहा है। यह तब हो रहा है जब रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के आंकड़ों के मुताबिक, मार्च 2022 और मार्च 2024 के बीच एक्सपोर्ट क्रेडिट में गिरावट आई है, जो क्रेडिट की उपलब्धता में कमी का संकेत देता है।
फाइनेंसिंग गैप्स से बढ़ी कॉम्पिटिटिवनेस की चिंता
यह संकट भारत की ट्रेड फाइनेंस व्यवस्था की अंदरूनी खामियों को उजागर कर रहा है। लेटर ऑफ क्रेडिट (Letter of Credit - LC) जैसे पारंपरिक साधनों पर निर्भरता अब नए जोखिमों का सामना कर रही है, जैसे कि लंबे शिपमेंट के कारण एलसी की अवधि (expiry) खत्म होना या उसमें विसंगतियां (discrepancies) आना। ये समस्याएँ छोटे और मध्यम आकार के उद्यमों (MSMEs) के लिए ख़ास तौर पर मुश्किल हैं, जो भारत के एक्सपोर्ट बेस का एक बड़ा हिस्सा हैं।
हालांकि, यूनियन बजट 2025-26 में MSMEs के लिए सब्सिडी और कोलेटरल (collateral) सहित एक्सपोर्ट सपोर्ट के लिए ₹7,295 करोड़ आवंटित किए गए हैं, लेकिन यह देखना बाकी है कि यह वर्तमान भू-राजनीतिक झटकों के सामने कितना प्रभावी साबित होगा। दुनिया भर में, एक्सपोर्ट क्रेडिट एजेंसीज़ (Export Credit Agencies - ECAs) कॉम्पिटिटिवनेस (competitiveness) बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती हैं। हो सकता है कि भारत के वित्तीय तंत्र (financial mechanisms) अन्य देशों की तुलना में कम फुर्तीले साबित हों, जिससे कॉम्पिटिटिव गैप (competitive gap) और बढ़ सकता है। पहले भी ऐसे झटकों, जैसे कि रेड सी संकट के पुराने मामले और रूस-यूक्रेन युद्ध, ने दिखाया है कि कैसे भू-राजनीतिक घटनाओं का ट्रेड फाइनेंस पर असर पड़ता है।
रूट पर निर्भरता और पॉलिसी गैप्स भी आए सामने
यह भू-राजनीतिक झटका यूरोप को होने वाले निर्यात के करीब 80% हिस्से के लिए महत्वपूर्ण रेड सी जैसे रूट पर भारत की ज़बरदस्त निर्भरता को भी उजागर करता है। यह निर्भरता एक बड़ी कमजोरी है, जिसके चलते रेड सी से कंटेनर शिपमेंट (container shipments) में 75% की गिरावट आई है और केप ऑफ गुड होप (Cape of Good Hope) की ओर रूट बदलना बढ़ा है। सर्विस एक्सपोर्ट्स (service exports) भले ही कुछ सहारा दे रहे हों, लेकिन मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट्स (merchandise exports) को काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। दिसंबर 2025 के आंकड़े दिखाते हैं कि इंपोर्ट (imports) एक्सपोर्ट से तेज़ी से बढ़े हैं, जिससे ट्रेड डेफिसिट (trade deficit) बढ़ा है।
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और जे.पी. मॉर्गन (J.P. Morgan) जैसी संस्थाएं चेतावनी दे रही हैं कि लगातार व्यवधान वैश्विक महंगाई (global inflation) को बढ़ा सकते हैं, जिससे आर्थिक स्थिरता और भरोसे पर असर पड़ेगा। इंडियन बैंकिंग एसोसिएशन (IBA) ने इन मुद्दों की समीक्षा करने का वादा किया है। अब सवाल यह है कि भारत के ट्रेड फाइनेंस के लिए तात्कालिक लचीलेपन (temporary flexibility) की ज़रूरत है या संरचनात्मक सुधारों (structural reforms) की। 2022 से 2024 के बीच एक्सपोर्ट क्रेडिट में आई गिरावट से लगता है कि सिस्टम ऐसे बड़े झटकों के लिए पूरी तरह तैयार नहीं था, जिससे निर्यातकों, खासकर MSMEs, पर वित्तीय दबाव का खतरा मंडरा रहा है।
एक्सपोर्टर्स समर्थन की मांग कर रहे
एक्सपोर्टर्स इन झटकों से निपटने के लिए ज़्यादा क्रेडिट लिमिट (credit limits) और लंबी फाइनेंसिंग टर्म्स (financing terms) की मांग कर रहे हैं। सरकार ने एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन (Export Promotion Mission) और MSMEs के लिए कोलेटरल सपोर्ट जैसी पहलों की शुरुआत की है। हालांकि, समुद्री रास्तों में जारी अस्थिरता और भू-राजनीतिक तनावों को देखते हुए, भारत के एक्सपोर्ट सेक्टर को बनाए रखने के लिए निरंतर निगरानी और अनुकूलनीय नीतियों (adaptive policies) की आवश्यकता होगी। ट्रेड बैलेंस (trade balance) और आर्थिक विकास पर इसका दीर्घकालिक प्रभाव (long-term impact) एक प्रमुख चिंता का विषय बना हुआ है।