क्या है कैपिटल एक्यूमुलेशन का भ्रम?
वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत में फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) के आँकड़े $94.5 अरब के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गए, जो पिछले साल के मुकाबले 17% ज़्यादा है। लेकिन इन आँकड़ों के पीछे एक गहरी सच्चाई छिपी है। कुल इक्विटी इनफ्लो $58.84 अरब तक पहुंचा, लेकिन असल में निवेश के तौर पर रह गया नेट FDI सिर्फ $7.7 अरब ही है। इसका मतलब है कि विदेशी पूंजी का एक बड़ा हिस्सा देश से बाहर जा रहा है, जो नए निवेश की रफ़्तार को धीमा कर रहा है।
अमेरिका का बढ़ता निवेश
निवेश के स्रोत देशों में सबसे बड़ा बदलाव अमेरिका की ओर से आया है, जहाँ इक्विटी निवेश दोगुना होकर $11.17 अरब तक पहुँच गया। इससे पता चलता है कि अमेरिकी कंपनियां भारत के तेज़ी से बढ़ते सेक्टर, खासकर टेक्नोलॉजी और सर्विसेज़ में ज़्यादा पैसा लगा रही हैं। सिंगापुर अभी भी सबसे बड़ा जरिया बना हुआ है, लेकिन अमेरिका की सीधी भागीदारी यह संकेत देती है कि वो टैक्स बचाने वाले रास्तों से बचकर सीधे निवेश करना चाहते हैं।
सेक्टर और राज्यों पर फोकस
FDI मुख्य रूप से कंप्यूटर सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर और सर्विसेज़ सेक्टर में ही आ रहा है, जिन्होंने मिलकर $23 अरब से ज़्यादा का निवेश आकर्षित किया। ये सेक्टर तेज़ी से बढ़ते तो हैं, लेकिन इनमें उतार-चढ़ाव का खतरा ज़्यादा होता है। राज्यों की बात करें तो महाराष्ट्र, कर्नाटक और गुजरात में सबसे ज़्यादा विदेशी निवेश आया है। यह एक बड़ी चुनौती है कि कैसे देश के बाकी राज्यों में भी औद्योगिक विकास को बढ़ावा दिया जाए, ताकि आय की असमानता कम हो सके।
जोखिम को समझें
निवेशकों को कुल इनफ्लो के आँकड़ों पर ध्यान से गौर करना चाहिए। जब पैसा वापस जाने (Repatriation) की प्रवृत्ति बढ़ जाती है, तो देश का बाहरी क्षेत्र ग्लोबल लिक्विडिटी में अचानक आने वाले बदलावों के प्रति ज़्यादा संवेदनशील हो जाता है। पारंपरिक मैन्युफैक्चरिंग FDI के विपरीत, जो इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करता है, वर्तमान में आ रहा ज़्यादातर पैसा सर्विस-ओरिएंटेड कंपनियों से जुड़ा है, जो अपने ऑपरेशन्स को तेज़ी से कम या ज़्यादा कर सकती हैं। इसके अलावा, मुनाफे की वापसी और विनिवेश ($53 अरब से ज़्यादा) की वजह से अर्थव्यवस्था में पैसों का बहुत तेज़ी से आना-जाना लगा हुआ है। ऐसे में, देश को नेट FDI को नेगेटिव होने से बचाने के लिए लगातार नए पूंजी प्रवाह की ज़रूरत पड़ती है, जिसका असर मुद्रा और विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ सकता है।
