ट्रेड डील का एक्सपोर्ट बूस्ट और सेक्टरों में दौड़
3 फरवरी 2026 का दिन भारतीय इक्विटी बाज़ार के लिए ऐतिहासिक रहा। बाज़ार ने अपने इतिहास की सबसे बड़ी सिंगल-डे इंट्रा-डे गेन (intraday gain) का रिकॉर्ड तोड़ा, जो पिछले 5 दिसंबर 2025 के 3041 अंकों के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ गया। BSE Sensex 4,200 अंकों से ज़्यादा चढ़ा और दिन के कारोबार में 85,871.73 का लेवल पार कर गया। इस शानदार तेज़ी की मुख्य वजह लंबे समय से प्रतीक्षित भारत-अमेरिका ट्रेड एग्रीमेंट (trade agreement) का साइन होना है। इस डील के तहत, अमेरिकी बाज़ार में भारतीय एक्सपोर्ट प्रोडक्ट्स पर लगने वाले टैरिफ (tariff) को 50% तक की ऊंचाई से घटाकर 18% कर दिया गया है। माना जा रहा है कि इससे टेक्सटाइल, एक्वाकल्चर, जेम्स और फार्मा जैसे महत्वपूर्ण सेक्टरों में भारत की कॉम्पिटिटिवनेस (competitiveness) काफी बढ़ जाएगी। इस ब्रॉड-बेस्ड रैली (broad-based rally) में BSE में लिस्टेड कंपनियों का कुल मार्केट कैप (market cap) लगभग ₹19 लाख करोड़ बढ़कर ₹467.10 लाख करोड़ तक पहुँच गया, जो निवेशकों के लिए एक बड़ी संपत्ति निर्माण की घटना साबित हुई। भले ही यह रैली व्यापक रही, लेकिन निफ्टी रियल्टी सेक्टर 4% से ज़्यादा उछला, वहीं केमिकल्स, फार्मा और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स जैसे सेक्टरों ने भी 3% से ऊपर का गेन दर्ज किया। बैंक निफ्टी (Bank Nifty) भी 2.43% की तेज़ी के साथ 60,041 पर बंद हुआ।
वैल्यूएशन और सस्टेनेबिलिटी पर सवाल
रिकॉर्ड तोड़ बाज़ार तेज़ी के बावजूद, वैल्यूएशन मेट्रिक्स (valuation metrics) पर गौर करें तो तस्वीर थोड़ी मिली-जुली दिखती है। फिलहाल BSE Sensex का P/E रेश्यो (ratio) लगभग 26 गुना है, जबकि NSE Nifty 50 करीब 23 गुना पर ट्रेड कर रहा है। ये दोनों ही अपने ऐतिहासिक औसत (लगभग 22x और 20x) से थोड़े ऊपर हैं। इसका मतलब यह है कि सेंटीमेंट (sentiment) में जबरदस्त सुधार हुआ है, लेकिन यह तेज़ी गहरी अंडरवैल्यूएशन (undervaluation) पर आधारित नहीं है, बल्कि ट्रेड डील से मिलने वाली भविष्य की ग्रोथ प्रोस्पेक्ट्स (growth prospects) के री-असेसमेंट (reassessment) पर टिकी है। ऐतिहासिक रूप से, बड़े ट्रेड लिबरलाइजेशन (trade liberalization) इवेंट्स ने बाज़ार में लगातार तेज़ी को बल दिया है, और Sensex का यह 2.54% का इंट्रा-डे गेन ऐसे बड़े द्विपक्षीय समझौतों के लिए उम्मीद की रेंज में है। हालांकि, दिन के दौरान बाज़ार में देखी गई एक्सट्रीम वोलैटिलिटी (extreme volatility), जहाँ इंडेक्स ने क्लोजिंग से पहले कुछ गेंस वापस कर दिए, यह दर्शाती है कि बाज़ार ग्लोबल ट्रेड डायनामिक्स (global trade dynamics) के प्रति कितना सेंसिटिव है।
नतीजों और एनालिस्ट्स की राय में अंतर
बाज़ार की इस ज़बरदस्त प्रतिक्रिया का हाल ही में खत्म हुए Q3 FY26 (अक्टूबर-दिसंबर 2025) के कॉर्पोरेट नतीजों (corporate results) से सीधा मेल नहीं खाता। इस तिमाही में कंपनियों के एग्रीगेट नेट प्रॉफिट ग्रोथ (aggregate net profit growth) में करीब 8% की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो कि 10-12% के कंसेंसस फोरकास्ट (consensus forecast) से कम है। खासकर IT और फाइनेंशियल जैसे सेक्टरों की ग्रोथ उम्मीद से धीमी रही। एनालिस्ट्स (analysts) का मानना है कि ट्रेड डील से एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड कंपनियों के प्रॉफिट में 3-5% तक का अपग्रेड (upgrade) आ सकता है, लेकिन वे व्यापक उत्साह को लेकर सतर्कता बरत रहे हैं। इन सेक्टरों के संभावित फायदों की भरपाई घरेलू इकोनॉमिक हेडविंड्स (domestic economic headwinds) और बाज़ार के दूसरे सेगमेंट में मार्जिन प्रेशर (margin pressure) से हो सकती है। इसलिए, बाज़ार की मौजूदा तेज़ी की सस्टेनेबिलिटी (sustainability) इस बात पर निर्भर करेगी कि एक्सपोर्ट-ड्रिवन गेंस (export-driven gains) कॉर्पोरेट प्रॉफिटेबिलिटी (corporate profitability) और इकोनॉमिक एक्टिविटी (economic activity) को कितना बड़ा बूस्ट दे पाते हैं।
करेंसी में मजबूती और फॉरेन फंड्स का फ्लो
इक्विटी रैली के साथ भारतीय रुपये (INR) में आई मजबूती, बाहरी कॉन्फिडेंस (external confidence) में सुधार का एक अहम संकेत है। ट्रेड डील के पॉजिटिव सेंटीमेंट, फॉरेन कैपिटल इनफ्लोज (foreign capital inflows) की उम्मीद और ग्लोबल सेंट्रलबैंक्स (central banks) की डोविश सिग्नल (dovish signals) से नरम पड़े USD के चलते करेंसी में मजबूती आई है। फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (Foreign Portfolio Investors - FPIs) ने फरवरी 2026 की शुरुआत में भारतीय इक्विटीज़ में फिर से दिलचस्पी दिखाई और पहले हफ्ते में करीब $500 मिलियन का इनफ्लो दर्ज किया गया। फॉरेन कैपिटल का यह इनफ्लो बाज़ार की मोमेंटम (momentum) को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है। हालांकि, रुपये की लॉगर-टर्म चाल (longer-term trajectory) भारत के ट्रेड बैलेंस (trade balance), इंटरेस्ट रेट डिफरेंशियल्स (interest rate differentials) और ग्लोबल मैक्रोइकॉनॉमिक ट्रेंड्स (global macroeconomic trends) से प्रभावित होगी।