पूर्व RBI गवर्नर रघुराम राजन को अमेरिकी फेडरल रिजर्व (US Fed) के एक बड़े टास्क फोर्स का सह-प्रमुख (Co-lead) बनाया गया है। यह टास्क फोर्स फेड के **$6.7 ट्रिलियन** के बैलेंस शीट की समीक्षा करेगा। यह फैसला भारत जैसे उभरते बाजारों में लिक्विडिटी (liquidity) और कैपिटल फ्लो (capital flow) को प्रभावित कर सकता है।
अमेरिकी फेडरल रिजर्व का बड़ा कदम
अमेरिका के सेंट्रल बैंक, फेडरल रिजर्व (US Fed) ने एक अहम फैसला लेते हुए पूर्व RBI गवर्नर रघुराम राजन को अपने $6.7 ट्रिलियन के विशाल बैलेंस शीट की समीक्षा करने वाले टास्क फोर्स का सह-प्रमुख नियुक्त किया है। फेड चेयर जेरोम पॉवेल के निर्देशन में बनी यह समिति, सेंट्रल बैंक की वर्तमान वित्तीय स्थिति का गहराई से विश्लेषण करेगी। यह नियुक्ति ऐसे समय में हुई है जब वैश्विक बाजार इस बात का आकलन कर रहे हैं कि कैसे प्रमुख सेंट्रल बैंक हालिया वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के बाद लंबी अवधि की आसान मौद्रिक नीति (easy money policy) से बाहर निकल सकते हैं।
वैश्विक लिक्विडिटी और कैपिटल फ्लो पर असर
इस टास्क फोर्स का मुख्य ध्यान फेडरल रिजर्व की बैलेंस शीट के लिए दीर्घकालिक रणनीति को परखना है, जो आक्रामक मौद्रिक प्रोत्साहन (monetary stimulus) के दौर में काफी बढ़ गई थी। भारतीय निवेशकों और नीति निर्माताओं के लिए यह एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है, क्योंकि अमेरिकी मौद्रिक नीति सीधे तौर पर वैश्विक वित्तीय स्थितियों को प्रभावित करती है। अगर यह टास्क फोर्स बैलेंस शीट को कम करने की सिफारिश करता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजारों में लिक्विडिटी (पैसे की उपलब्धता) कम हो सकती है। ऐतिहासिक रूप से, जब वैश्विक लिक्विडिटी घटती है, तो भारत जैसे उभरते बाजारों में विदेशी संस्थागत निवेश (FII) के प्रवाह में अक्सर अस्थिरता देखी जाती है।
आर्थिक स्थिरता और बाजार के दबाव में संतुलन
हालांकि फेड के बैलेंस शीट के छोटे होने की संभावना से कैपिटल फ्लो में अल्पकालिक उतार-चढ़ाव हो सकता है, लेकिन यह लंबी अवधि में अधिक स्थिर और अनुमानित आर्थिक माहौल बनाने में भी योगदान दे सकता है। अत्यधिक मौद्रिक प्रोत्साहन के दौर ने अक्सर वैश्विक बाजारों में संपत्ति की कीमतों (asset prices) और जोखिम प्रीमियम (risk premiums) को विकृत किया था। अधिक सामान्य बैलेंस शीट की ओर बढ़ने से, फेड इन विकृतियों को कम करने का लक्ष्य रख सकता है। हालांकि, निवेशकों के लिए जोखिम इस बदलाव की गति में निहित है। नीति में अचानक या आक्रामक बदलाव उभरती अर्थव्यवस्थाओं में इक्विटी और बॉन्ड बाजारों पर दबाव डाल सकता है, जबकि एक क्रमिक दृष्टिकोण बाजारों को बिना किसी बड़े तनाव के समायोजित होने दे सकता है।
भविष्य की नीतियों पर नजर
अब निवेशक इस टास्क फोर्स द्वारा प्रस्तुत निष्कर्षों और सिफारिशों पर नजर रखेंगे। किसी भी संभावित नीतिगत बदलाव के लिए विशिष्ट समय-सीमा और इन निष्कर्षों के बारे में फेड का संचार महत्वपूर्ण होगा। बाजार प्रतिभागी संभवतः यह ट्रैक करेंगे कि ये चर्चाएं अमेरिकी ब्याज दर की उम्मीदों और डॉलर की समग्र मजबूती को कैसे प्रभावित करती हैं, क्योंकि ये दोनों कारक भारतीय रुपये और घरेलू बाजार की लिक्विडिटी पर प्रभाव का आकलन करने के लिए आवश्यक हैं।
