लिक्विडिटी इंजेक्शन का दांव
यह ऑक्शन 2.5 गुना से भी ज़्यादा ओवरसब्सक्राइब हुआ, यानी $10 अरब की पेशकश पर $25.03 अरब डॉलर की बोलियां आईं। सेंट्रल बैंक ने 118 बोलियां स्वीकार कीं और प्रीमियम कट-ऑफ 7.48 रुपये पर तय किया। इस कदम से फाइनेंशियल सिस्टम में $23 अरब से ज़्यादा की लिक्विडिटी डाली जाएगी। यह कदम RBI की मॉनेटरी पॉलिसी ट्रांसमिशन (Monetary Policy Transmission) को मज़बूत करने की रणनीति का हिस्सा है, ताकि पिछली बार दरों में की गई कटौती का पूरा असर इकोनॉमी तक पहुँच सके।
रुपये की कमजोरी के बीच राह
लेकिन, यह लिक्विडिटी (Liquidity) बढ़ाने का खेल एक मुश्किल माहौल में हो रहा है। भारतीय रुपया इस साल एशिया में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला रहा है। 4 फरवरी 2026 को यह डॉलर के मुकाबले लगभग 90.41 पर कारोबार कर रहा था। इससे पहले जनवरी 2026 में यह रिकॉर्ड 92.29 के स्तर को छू गया था, जो पिछले 12 महीनों में 3.42% की गिरावट दर्शाता है। इस लगातार कमजोरी को संभालने के लिए RBI को फॉरेन एक्सचेंज मार्केट (Foreign Exchange Market) में दखल देना पड़ रहा है। डॉलर बेचकर रुपये को संभालने की ये कोशिशें, दरअसल, बैंकिंग सिस्टम से रुपये की लिक्विडिटी खींच लेती हैं। ऐसे में, RBI जहां एक तरफ स्वैप के ज़रिए लिक्विडिटी डाल रहा है, वहीं दूसरी तरफ रुपये को बचाने के चक्कर में लिक्विडिटी निकाल भी रहा है, जो एक विरोधाभास (Paradox) पैदा करता है।
सिस्टम लिक्विडिटी पर दबाव और नीतिगत चुनौतियाँ
इस बड़े लिक्विडिटी इंजेक्शन (Liquidity Injection) के बावजूद, बैंकिंग सिस्टम पर दबाव बना हुआ है। जनवरी 2026 में क्रेडिट ग्रोथ (Credit Growth) पिछले साल के मुकाबले करीब 13.1% रही, जबकि डिपॉजिट ग्रोथ (Deposit Growth) सिर्फ 10.6% रही। इस अंतर ने बैंकिंग सिस्टम के क्रेडिट-डिपॉजिट रेशियो (Credit-Deposit Ratio) को रिकॉर्ड 82.2% पर पहुंचा दिया है। इसका मतलब है कि बैंक अपने डिपॉजिट का ज़्यादातर हिस्सा लोन के तौर पर दे रहे हैं। इसके अलावा, सिस्टम लिक्विडिटी (System Liquidity) में भी काफी कमी आई है, जो जनवरी 2026 में घटकर ₹66,000 करोड़ रह गई, जो RBI के सहूलियत स्तर से काफी नीचे है। RBI द्वारा सितंबर और नवंबर 2025 के बीच किए गए $30 अरब के फॉरेन एक्सचेंज (FX) इंटरवेंशन्स (Interventions) ने भी इस लिक्विडिटी की कमी में योगदान दिया।
आगे की राह: स्थिरता और ट्रांसमिशन
आगे चलकर, RBI से उम्मीद है कि वह फरवरी की अपनी मॉनेटरी पॉलिसी मीटिंग (Monetary Policy Meeting) में पॉलिसी रेपो रेट (Policy Repo Rate) को 5.25% पर ही बनाए रखेगा। अब उनका ध्यान ब्याज दरों के असर को इकोनॉमी तक पहुंचाने और करेंसी की स्टेबिलिटी (Currency Stability) पर रहेगा। विश्लेषकों का अनुमान है कि 2026 के अंत तक रुपया 90 के आसपास रह सकता है। RBI के सामने एक नाज़ुक संतुलन बनाने की चुनौती है: एक ओर ग्रोथ और मॉनेटरी पॉलिसी ट्रांसमिशन (Monetary Policy Transmission) के लिए लिक्विडिटी डालना, तो दूसरी ओर करेंसी पर दबाव को संभालना और वित्तीय क्षेत्र में ज़्यादा लीवरेज (Leverage) को रोकना। भारत की आर्थिक गति को बनाए रखने के लिए यह संतुलन बहुत ज़रूरी होगा।
