RBI का बड़ा दांव: रुपया बचाने के लिए रिकॉर्ड फॉरवर्ड पोजीशन
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार प्रबंधन के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक कदम उठाया है। मार्च में, RBI ने डॉलर शॉर्ट-फॉरवर्ड पोजीशन को रिकॉर्ड $104.16 अरब तक बढ़ा दिया। यह पिछले महीने की तुलना में 34% की एक बड़ी बढ़ोतरी है और पहली बार है जब केंद्रीय बैंक की फॉरवर्ड बुक $100 अरब के पार गई है। यह आक्रामक विस्तार विदेशी मुद्रा हस्तक्षेपों (foreign exchange interventions) की प्रतिक्रिया है, जो भारतीय रुपये को बढ़ती अस्थिरता से बचाने के लिए किए जा रहे हैं। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष एक प्रमुख कारण रहा, जिसने मार्च में रुपये को 4.24% और साल-दर-साल 5.6% तक गिरा दिया था।
हस्तक्षेप क्षमता पर दबाव, RBI की बदली रणनीति
विश्लेषकों का मानना है कि RBI की शॉर्ट-फॉरवर्ड बुक में इतनी बड़ी बढ़ोतरी यह संकेत देती है कि केंद्रीय बैंक सीधे अपने रिजर्व से बड़ी मात्रा में डॉलर बेचने में सीमित हो सकता है। इसलिए, RBI अब अपने हस्तक्षेपों के प्रभाव को घरेलू लिक्विडिटी (liquidity) पर पड़ने से रोकने के लिए फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स का इस्तेमाल कर रहा है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य घरेलू आपूर्ति को प्रभावित किए बिना हस्तक्षेप के असर को कम करना है। इस रणनीति में Open Market Operations (OMOs) जैसे तरीकों का भी उपयोग शामिल है। यह मुद्रा प्रबंधन के लिए एक अधिक सतर्क दृष्टिकोण दिखाता है, जो सीधे हस्तक्षेप की सीमाओं को स्वीकार करता है।
अंदरूनी जोखिम: भारत की संरचनात्मक कमजोरियां
RBI के इन उपायों के बावजूद, भारतीय अर्थव्यवस्था की कुछ संरचनात्मक कमजोरियां रुपये की स्थिरता के लिए बड़ा जोखिम बनी हुई हैं। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण ब्रेंट क्रूड (Brent crude) की कीमतें $110 प्रति बैरल के पार चली गई हैं, जिससे भारत का आयात बिल काफी बढ़ गया है और ग्लोबल सप्लाई चेन व माल ढुलाई की लागत बाधित हुई है। भारत, जो अपनी 85% से अधिक क्रूड ऑयल की ज़रूरतें आयात करता है, इन मूल्य झटकों के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील है, जो सीधे उसके करंट अकाउंट डेफिसिट (current account deficit) को बढ़ाते हैं। अनुमान है कि यह डेफिसिट GDP के 3% को पार कर सकता है, जो रुपये के लिए कमजोरी का संकेत है। इसके अलावा, विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) में भारी बिकवाली देखी गई है, जिससे इस साल $20 अरब से ज़्यादा की निकासी हुई है। RBI की $100 अरब के करीब नेट शॉर्ट फॉरवर्ड बुक का मतलब है कि भविष्य में डॉलर की मांग बनी रहेगी, जो रुपये में किसी भी स्थायी मजबूती को सीमित कर सकती है, भले ही आर्थिक फंडामेंटल में सुधार हो। अक्टूबर 2025 में 7.4 महीने का आयात कवर भी पूंजी प्रवाह की ज़रूरत को बताता है, जो वर्तमान अनिश्चितता वाले माहौल में एक चुनौती है।
आगे की राह: रुपये पर दबाव जारी रहने की उम्मीद
आगे चलकर, रुपया दबाव में रह सकता है। IDFC First Bank और Barclays जैसी संस्थाएं अनुमान लगा रही हैं कि RBI के समर्थन के बावजूद रुपया 95-96 प्रति डॉलर तक कमजोर हो सकता है। भारत के 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड (government bonds) पर यील्ड (yield) बढ़कर 7.06% हो गया है, जो ऊर्जा की कीमतों के कारण बढ़ती महंगाई की चिंताओं को दर्शाता है। जबकि RBI की बाज़ार को स्थिर रखने और अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित करने की रणनीति स्थापित है, भू-राजनीतिक झटके, तेल की कीमतों में लगातार अस्थिरता और अपर्याप्त पूंजी प्रवाह एक चुनौतीपूर्ण माहौल बना रहे हैं। RBI की बड़ी फॉरवर्ड बुक, हस्तक्षेप में लचीलापन प्रदान करती है, लेकिन यह भविष्य में डॉलर की मांग को भी दर्शाती है, जो रुपये की किसी भी महत्वपूर्ण रिकवरी को सीमित कर सकती है।
