RBI के सख्त कदमों ने संभाला मोर्चा
रुपये को स्थिरता देने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने कई अहम कदम उठाए हैं। केंद्रीय बैंक ने बैंकों और कंपनियों के लिए पोजीशन लिमिट तय कर दी है, ताकि डोमेस्टिक और ऑफशोर मार्केट के बीच ट्रेडिंग के अंतर को कम किया जा सके। इन नियमों के तहत, संस्थानों को 10 अप्रैल तक अपनी डॉलर होल्डिंग्स को कम करना था। इसके चलते लोकल मार्केट में डॉलर की बिकवाली बढ़ी, जिससे रुपया गुरुवार के 93.10 से सुधरकर आज 93 पर खुला। RBI ने बैंकों को कुछ खास फॉरेन एक्सचेंज कॉन्ट्रैक्ट्स देने से भी रोक दिया है, जिसका मकसद रुपये को स्थिर करना है। हालांकि, ट्रेडर्स का मानना है कि ये कदम शॉर्ट-टर्म (short-term) राहत दे सकते हैं, पर ये मूल कारणों का समाधान नहीं करते, खासकर जब 10 अप्रैल की डेडलाइन नजदीक आ रही है।
वैश्विक झटकों का असर
पश्चिम एशिया (West Asia) में चल रहे भू-राजनीतिक तनावों के कारण ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent crude oil) की कीमतें करीब $109-$111 प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं। भारत एक बड़ा एनर्जी इम्पोर्टर (energy importer) है, इसलिए कीमतों में यह उछाल सीधे तौर पर हमारे आयात की लागत को बढ़ाता है और तेल के भुगतान के लिए अमेरिकी डॉलर की मांग को भी बढ़ाता है। पिछले अनुभवों से पता चलता है कि तेल की कीमतों में ऐसी बढ़ोतरी अक्सर रुपये को कमजोर करती है।
इसके अलावा, एक बड़ा झटका विदेशी पूंजी (foreign capital) के बड़े पैमाने पर बाहर निकलने से लगा है। फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) ने मार्च 2026 में भारतीय शेयरों (Indian stocks) में अनुमानित $13.6 बिलियन की बिकवाली की। पिछले एक साल में $19 बिलियन से ज्यादा के आउटफ्लो (outflow) के बाद यह बड़ी बिकवाली रुपये पर और दबाव डाल रही है। इसी तरह की मुश्किलें मार्च में अन्य एशियाई करंसी (Asian currencies) को भी झेलनी पड़ीं; उदाहरण के लिए, दक्षिण कोरियाई वॉन (South Korean won) डॉलर के मुकाबले लगभग 6.5% गिर गया।
RBI के रिजर्व पर भी पड़ा असर
लगातार वैश्विक आर्थिक दबावों के बीच RBI के हस्तक्षेप पर कड़ी चुनौती है। 27 मार्च 2026 तक भारत के फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व (foreign exchange reserves) $10 बिलियन से ज्यादा घटकर $688.06 बिलियन हो गए। यह गिरावट RBI द्वारा रुपये को सहारा देने के लिए की गई डॉलर की बिकवाली की सीमा को दर्शाती है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि रुपये में गिरावट का मूल दबाव अब भी बना हुआ है, जिसे नए नियम पूरी तरह से खत्म नहीं कर सकते।
एनालिस्ट फोरकास्ट (Analyst forecasts) भी इन चिंताओं को दोहरा रहे हैं। कुछ का अनुमान है कि अगर तेल की कीमतें इसी तरह ऊंची बनी रहीं, तो रुपया डॉलर के मुकाबले 95-100 तक गिर सकता है। Wallet Investor का अनुमान है कि 2026 के अंत तक USD/INR 93.21 रहेगा, जबकि Traders Union की उम्मीदें 97.6976 के करीब हैं। RBI के नए नियम, खासकर 10 अप्रैल की पोजीशन लिमिट की डेडलाइन, शायद मूल कारणों को ठीक करने के बजाय बाजार में अल्पकालिक (short-term) उतार-चढ़ाव पैदा करें।
कुल मिलाकर, भारतीय रुपये का भविष्य काफी हद तक घरेलू नीतियों और वैश्विक शक्तियों के बीच संतुलन पर निर्भर करेगा। RBI के कदम स्थिरता लाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन बढ़ती तेल कीमतें और FPIs का पैसा निकालना बड़े जोखिम पैदा कर रहे हैं। बाजार 10 अप्रैल की डेडलाइन के असर, पश्चिम एशिया की घटनाओं और वैश्विक पूंजी के प्रवाह पर बारीकी से नजर रखेगा।