लिक्विडिटी की बड़ी मदद
RBI ने ओपन मार्केट ऑपरेशन (OMO) के तहत ये ज़बरदस्त खरीदारी की है। इस भारी हस्तक्षेप से बैंकिंग सिस्टम में अच्छी खासी लिक्विडिटी आई है, जो सरकार के बड़े बॉरोइंग प्रोग्राम के चलते पैदा होने वाली लिक्विडिटी की कमी को दूर करने में मदद कर रही है। RBI का ये कदम बाज़ार को स्थिर रखने, बॉन्ड यील्ड्स (Bond Yields) को बहुत ज़्यादा बढ़ने से रोकने और क्रेडिट ग्रोथ के लिए ज़रूरी फंड्स मुहैया कराने के लिए उठाया गया है। खासकर कैपिटल आउटफ्लो (Capital Outflows) और करेंसी डेप्रिसिएशन (Currency Depreciation) के दबाव के बीच यह ज़रूरी हो जाता है। इतिहास गवाह है कि RBI अक्सर OMOs का इस्तेमाल करता रहा है, जैसे कि कोविड-19 महामारी के दौरान या 'ऑपरेशन ट्विस्ट' जैसे विशेष ऑपरेशन्स में। हाल के दिनों में, RBI ने ₹50,000 करोड़ के OMO परचेज की कई किश्तें जारी की हैं, जो लिक्विडिटी सपोर्ट के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। कुछ बाज़ार जानकारों का मानना है कि पिछले एक साल में RBI ने OMOs के ज़रिए सेंट्रल गवर्नमेंट की कुल बॉन्ड सप्लाई का लगभग 75% सोख लिया है।
FY27 का कर्ज़ का पहाड़
आने वाले फाइनेंशियल ईयर 2026-27 के लिए सरकार ने ₹17.2 लाख करोड़ के ग्रॉस बॉरोइंग (Gross Borrowing) का जो लक्ष्य रखा है, उसने बॉन्ड मार्केट पर गहरी छाप छोड़ी है। यह आंकड़ा बाज़ार की उम्मीदों से कहीं ज़्यादा है और FY26 के ₹14.8 लाख करोड़ के बॉरोइंग से काफी ज़्यादा है। इस ऐलान के तुरंत बाद, 10-साल के बेंचमार्क सरकारी बॉन्ड की यील्ड 6.77% और 6.78% को पार कर गई, जो पिछले करीब एक साल का उच्चतम स्तर है। बाज़ार विश्लेषकों को उम्मीद है कि आने वाले हफ़्तों में यील्ड्स 7% या उससे ऊपर जा सकती हैं। यील्ड्स में इस तेज़ी की मुख्य वजह नए डेट इश्यू की भारी मात्रा है, जिससे मार्केट में सप्लाई और डिमांड के बीच असंतुलन पैदा हो गया है। बढ़ी हुई यील्ड्स का मतलब है सरकार, राज्यों और कंपनियों के लिए कर्ज़ लेने की लागत का बढ़ना, जो आर्थिक प्रबंधन को और मुश्किल बना सकता है।
स्ट्रक्चरल कमजोरियां: क्या RBI का सहारा काफी है?
RBI की आक्रामक OMO खरीद, लिक्विडिटी को स्थिर करने और यील्ड्स को कंट्रोल करने के लिए ज़रूरी तो है, लेकिन यह इस बात की ओर इशारा करती है कि बाज़ार में सरकारी डेट के रिकॉर्ड स्तर को खुद से सोखने की क्षमता पर शायद दबाव है। सेंट्रल बैंक के इस भारी इंटरवेंशन पर ज़्यादा निर्भरता, इस रणनीति की लंबी अवधि की सस्टेनेबिलिटी (sustainability) पर सवाल खड़े करती है। FY27 के लिए बॉरोइंग प्लान का स्केल बताता है कि यह निर्भरता और बढ़ सकती है, जिससे RBI के लिए इन्फ्लेशन (inflation) को कंट्रोल करते हुए सरकार की फिस्कल (fiscal) ज़रूरतों को पूरा करने की चुनौती और बढ़ेगी। जियोपॉलिटिकल टेंशन (geopolitical tensions) और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव लगातार अनिश्चितता पैदा कर रहे हैं, जो सीधे तौर पर इन्फ्लेशन एक्सपेक्टेशंस (inflation expectations) को प्रभावित करते हैं और मॉनेटरी पॉलिसी (monetary policy) पर फिर से विचार करने को मज़बूर करते हैं, जिससे बॉन्ड मार्केट में और वोलैटिलिटी (volatility) आती है। ऐसे में, RBI की पॉलिसी के संकेतों की बजाय, टेक्निकल मार्केट फैक्टर्स और सप्लाई-डिमांड का दबाव, यील्ड कर्व के लंबे छोर पर प्राइस डिस्कवरी (price discovery) को ज़्यादा प्रभावित कर रहा है। मार्केट की एब्जॉर्प्शन कैपेसिटी (absorption capacity) की कड़ी परीक्षा हो रही है, और भले ही RBI पर्याप्त लिक्विडिटी सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखता हो, यील्ड्स पर लगातार ऊपर की ओर दबाव यह बताता है कि बढ़ती सप्लाई के मुकाबले डिमांड तालमेल बिठाने के लिए संघर्ष कर रही है। 1 अप्रैल, 2026 से लागू होने वाले नए रेगुलेटरी बदलाव, जो कैपिटल मार्केट इंटरमीडियरीज के लिए पूरी तरह से कोलेटरलाइज्ड क्रेडिट (fully collateralized credit) को अनिवार्य करते हैं, वे भी मार्केट लिक्विडिटी को थोड़ा बदल सकते हैं, जिससे सिस्टम में लीवरेज (leverage) थोड़ा टाइट हो सकता है।
आगे का रास्ता
आने वाले समय में, बाज़ार को लगातार वोलैटिलिटी और यील्ड प्रेशर की उम्मीद है, जो बड़े बॉरोइंग कैलेंडर और मौजूदा मैक्रो-इकोनॉमिक फैक्टर्स (macro-economic factors) से प्रेरित होगा। विश्लेषकों का मानना है कि RBI लिक्विडिटी मैनेजमेंट में सक्रिय रहेगा और ज़रूरत पड़ने पर यील्ड्स में अत्यधिक हलचल को रोकने के लिए और इंटरवीन (intervene) कर सकता है, भले ही सेंट्रल बैंक ग्रोथ को सपोर्ट करने और इन्फ्लेशन को कंट्रोल करने के बीच एक मुश्किल संतुलन बना रहा हो। सरकार का डेट-टू-जीडीपी रेश्यो (debt-to-GDP ratio) को अपना फिस्कल एंकर (fiscal anchor) बनाने की ओर रणनीतिक बदलाव कुछ भरोसा दे सकता है, जो कंसोलिडेशन (consolidation) के प्रति प्रतिबद्धता का संकेत देता है, लेकिन तत्काल चुनौती भारी भरकम बॉरोइंग ज़रूरतों को पूरा करना है। RBI के घोषित पॉलिसी स्टैंड और बॉन्ड मार्केट के व्यवहार के बीच का अंतर संभवतः बना रहेगा, जिसमें सप्लाई-साइड मैकेनिक्स (supply-side mechanics) यील्ड्स के निर्धारण में प्रमुख भूमिका निभाएंगे। भले ही भारतीय बॉन्ड मार्केट APAC पीयर्स (APAC peers) की तुलना में ज़्यादा यील्ड्स दे रहा है, जो निवेशकों को आकर्षित कर सकता है, लेकिन इस स्थिति की सस्टेनेबिलिटी (sustainability) इस बात पर निर्भर करती है कि बाज़ार लगातार, बड़े पैमाने पर सेंट्रल बैंक के इंटरवेंशन के बिना डेट को सोख पाता है या नहीं।