RBI का फोकस: महंगाई पर कैसे रखें लगाम?
RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव को देखते हुए कहा है कि भारत के लिए सबसे बड़ा मैक्रोइकोनॉमिक जोखिम 'तुरंत सप्लाई शॉक' नहीं, बल्कि 'लगातार बनी रहने वाली महंगाई' है। इस वजह से, सेंट्रल बैंक एक फ्लेक्सिबल ('लचीली') 'रुको और देखो' की रणनीति अपना रहा है। RBI की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि महंगाई को लेकर लोगों की उम्मीदें (inflation expectations) स्थिर रहें, बजाय इसके कि अभी मॉनेटरी पॉलिसी को तुरंत सख्त किया जाए। यह कदम वैश्विक अनिश्चितता के बीच RBI को अपनी नीतियों में लचीलापन बनाए रखने का मौका देगा। हालांकि, अगर सप्लाई चेन में लंबे समय तक व्यवधान रहा, तो RBI को अपनी पॉलिसी बदलनी पड़ सकती है। मल्होत्रा ने 'सेकंड-राउंड इफेक्ट्स' पर चिंता जताई है, जिसमें सप्लाई की कीमतों में अस्थायी उछाल आम कीमतों के स्तर में स्थायी रूप से शामिल हो सकता है। RBI फिलहाल शुरुआती झटकों, जैसे कच्चे तेल की कीमतों में उछाल, को नजरअंदाज कर रहा है, जब तक कि वे व्यापक मूल्य व्यवहार को प्रभावित न करें।
पश्चिम एशिया पर भारत की निर्भरता
भारत का पश्चिम एशिया के साथ आर्थिक रिश्ता काफी मजबूत है। यह क्षेत्र भारत के कुल एक्सपोर्ट (निर्यात) का लगभग छठे हिस्से और इम्पोर्ट (आयात) का पांचवें हिस्से का योगदान करता है। सबसे अहम बात यह है कि भारत के कच्चे तेल का आधा और फर्टिलाइजर (खाद) का पांच में से दो हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है। इस भारी निर्भरता का मतलब है कि लंबे समय तक चलने वाले व्यवधान, खासकर एनर्जी सप्लाई में, सीधे तौर पर घरेलू महंगाई और आर्थिक ग्रोथ के लिए खतरा बन सकते हैं। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85-90% कच्चा तेल इम्पोर्ट करता है, जिसमें से करीब आधा पश्चिम एशिया से आता है। यह निर्भरता बढ़ी है, फाइनेंशियल ईयर 2026 (FY26) के पहले दस महीनों में इम्पोर्ट 88.5% तक पहुंच गया। पश्चिम एशिया के पिछले संकटों ने भारतीय रुपये (INR) को कमजोर किया है और शेयर बाजारों को प्रभावित किया है। उदाहरण के लिए, मार्च 2026 में भारतीय कच्चे तेल की टोकरी की कीमत फरवरी की तुलना में 64.5% से अधिक बढ़ गई थी, जिसने उपभोक्ताओं की कीमतों को प्रभावित किया। इंडोनेशिया और रूस जैसे अन्य उभरते बाजारों के सेंट्रल बैंकों ने भी सतर्क नीतियां अपनाई हैं, जो महंगाई और ग्रोथ के बीच संतुलन बना रही हैं। लेकिन, भारत की फॉसिल फ्यूल (जीवाश्म ईंधन) पर संरचनात्मक निर्भरता, जो उसके प्राथमिक ऊर्जा का लगभग 75% हिस्सा है, एक अनोखी चुनौती पेश करती है।
पॉलिसी की चुनौतियां और जोखिम
RBI की 'शुरुआती प्राइस शॉक को नजरअंदाज करने' की रणनीति में जोखिम भी हैं, खासकर भारत की उच्च आयात निर्भरता को देखते हुए। अगर कच्चे तेल की कीमतें लगातार $90-$100 प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं, तो भारत के करंट अकाउंट डेफिसिट (चालू खाता घाटा) में काफी बढ़ोतरी हो सकती है, रुपया और कमजोर हो सकता है, और सरकारी सब्सिडी का खर्च बढ़ सकता है। महंगाई काफी बढ़ सकती है; $100 प्रति बैरल से ऊपर तेल की कीमतें सीपीआई (CPI) महंगाई को 5.5%-6% तक धकेल सकती हैं। कई उभरते बाजार सेंट्रल बैंकों की तरह, RBI भी आर्थिक रिकवरी को बाधित किए बिना महंगाई को नियंत्रित करने की चुनौती का सामना कर रहा है। हालांकि, केवल उम्मीदों को प्रबंधित करने पर RBI का ध्यान लगातार इंपोर्टेड महंगाई के खिलाफ पर्याप्त नहीं हो सकता है। एक बड़ी चिंता यह है कि अगर RBI यह गलत अनुमान लगाता है कि ये झटके कितने समय तक टिकेंगे या वे कीमतों को कितनी जल्दी प्रभावित करेंगे, तो पॉलिसी में गलतियां हो सकती हैं। जबकि RBI के पास लिक्विडिटी (तरलता) को प्रबंधित करने के लिए रेपो रेट, सीआरआर (CRR) और ओएमओ (OMO) जैसे उपकरण हैं, एक संरचनात्मक बाहरी झटके के खिलाफ उनकी प्रभावशीलता पर बहस जारी है। आयातित ऊर्जा पर राष्ट्र की भारी निर्भरता इसे वैश्विक मूल्य उतार-चढ़ाव के प्रति बहुत संवेदनशील बनाती है, जो होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे शिपिंग मार्गों से बढ़ा हुआ जोखिम है।
आगे का रास्ता: संकट की अवधि पर निर्भर करेगी पॉलिसी
महंगाई का भविष्य का रास्ता और RBI द्वारा की जाने वाली कोई भी नीतिगत समायोजन इस बात पर निर्भर करेगा कि पश्चिम एशिया में व्यवधान कितने समय और कितनी गंभीरता से जारी रहते हैं। जबकि भारत आयात स्रोतों में विविधता लाने और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए काम कर रहा है, विदेशी ऊर्जा और आवश्यक आयात पर इसकी संरचनात्मक निर्भरता एक प्रमुख कमजोरी बनी हुई है। यदि सप्लाई शॉक बने रहते हैं और मूल्य व्यवहार को महत्वपूर्ण रूप से बदलते हैं, तो स्थायी महंगाई RBI को अपने तटस्थ, 'रुको और देखो' रुख से हटने के लिए मजबूर कर सकती है। इससे ग्रोथ पर तत्काल प्रभाव के बावजूद, मूल्य स्थिरता की रक्षा के लिए नीतिगत सख्ती हो सकती है। विश्लेषकों का अनुमान है कि भले ही पश्चिम एशिया संकट कम हो जाए, 2026-27 में वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें औसतन $85-90 प्रति बैरल रह सकती हैं, जो भारत की अर्थव्यवस्था पर लगातार दबाव का संकेत देता है।
