वैश्विक तनाव से अर्थव्यवस्था पर छाया संकट
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की अप्रैल बुलेटिन ने बाहरी आर्थिक दबावों को लेकर चिंता जताई है। अब ध्यान सिर्फ सप्लाई में रुकावटों से हटकर इस बात पर आ गया है कि कैसे लंबे समय तक चलने वाले भू-राजनीतिक संघर्ष (geopolitical conflict) से डिमांड कमजोर हो सकती है। हालांकि भारत मजबूत दिख रहा है, लेकिन पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और सप्लाई चेन पर इनके असर के कारण वैश्विक आर्थिक रिकवरी लगातार नाजुक बनी हुई है। थोड़ी सी सीजफायर (ceasefire) के बावजूद जोखिम बना हुआ है, जिसके चलते ग्रोथ और इन्फ्लेशन (inflation) के अनुमानों को फिर से आंकना पड़ रहा है।
इन्फ्लेशन की मार, तेल की मांग में गिरावट
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने वैश्विक सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ा दिया है, जिससे एनर्जी कॉस्ट (energy cost) का अनुमान बढ़ गया है और इनपुट प्राइसेज (input prices) को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। S&P Global Energy अब 2026 में वैश्विक तेल मांग में प्रति दिन केवल 400,000 बैरल की वृद्धि का अनुमान लगा रहा है, जो पहले के 1.1 मिलियन बैरल प्रति दिन के अनुमान से काफी कम है। साथ ही, 2026 के लिए ब्रेंट तेल की कीमत का अनुमान भी बढ़ाकर $96 प्रति बैरल कर दिया है। भारत के लिए, इन कारकों का मतलब है एनर्जी और इनपुट की ऊंची लागत। कच्चे तेल की कीमतों में 10% की वृद्धि से इन्फ्लेशन RBI के लक्ष्य से 0.5 प्रतिशत अंक ऊपर जा सकता है। IMF का यह भी कहना है कि उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं (emerging markets), खासकर कमोडिटी (commodity) इम्पोर्ट करने वाले देश, ज्यादा जोखिम में हैं। उनके ग्रोथ अनुमान कम किए गए हैं और 2026 के लिए इन्फ्लेशन के अनुमान बढ़ाए गए हैं। इससे सप्लाई शॉक (supply shock) के डिमांड शॉक (demand shock) में बदलने की संभावना बढ़ जाती है, जिससे कंजम्पशन (consumption) और इन्वेस्टमेंट (investment) धीमा हो सकता है।
भारत की आर्थिक मजबूती की परीक्षा
भारत की आर्थिक बुनियाद (economic fundamentals) वैश्विक चुनौतियों के खिलाफ एक बफर प्रदान करती है। स्ट्रक्चरल सुधारों (structural improvements), जैसे तेल इम्पोर्ट पर निर्भरता में कमी (GDP का 8.5% से घटकर 4.8%), अर्थव्यवस्था को तेल की कीमतों के उतार-चढ़ाव के प्रति कम संवेदनशील बनाती है। पिछले प्रदर्शन से पता चलता है कि भारत संकटों को अवसरों में बदल सकता है, जैसा कि COVID-19 के बाद देखा गया। SBI Research के एनालिस्ट्स (analysts) FY27 के लिए GDP ग्रोथ 6.8% से 7.1% के बीच रहने का अनुमान लगा रहे हैं, जबकि HDFC Securities लगभग 6.5% की उम्मीद कर रहा है। यह मजबूती मजबूत घरेलू मांग और सहायक नीतियों (supportive policies) से आती है। हालांकि, कुछ सतर्क विचार भी हैं। Moody's Ratings ने एनर्जी की ऊंची लागत के कारण भारत के FY27 ग्रोथ अनुमान को घटाकर 6% कर दिया है, और HSBC ने तेल की कीमतों की अनिश्चितता को देखते हुए भारत को 'अंडरवेट' (underweight) कर दिया है। वैश्विक स्तर पर, IMF का अनुमान है कि 2026 में एडवांसड इकोनॉमीज (advanced economies) की तुलना में उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में ग्रोथ का धीमापन ज्यादा होगा।
डिमांड शॉक का खतरा मंडरा रहा है
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष में महत्वपूर्ण डाउनसाइड रिस्क (downside risks) हैं जो भारत की आर्थिक लचीलापन (resilience) को चुनौती दे सकते हैं। एक लंबे समय तक या बढ़ते संघर्ष से तेल की कीमतें ऊंची रह सकती हैं, जो औसतन $96 प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं, और इन्फ्लेशन को काफी बढ़ा सकती हैं। EY Economy Watch का अनुमान है कि यदि ये प्रभाव FY27 तक जारी रहते हैं, तो भारत की CPI इन्फ्लेशन अनुमानित दर से 1.5 प्रतिशत अंक अधिक हो सकती है, और रियल GDP ग्रोथ (real GDP growth) लगभग 1 प्रतिशत तक सिकुड़ सकती है। ऐसी स्थिति में RBI को अपना रुख बदलने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है, संभवतः ग्रोथ धीमी होने पर भी मॉनेटरी पॉलिसी (monetary policy) को टाइट (tighten) करना पड़ सकता है। S&P Global Ratings ने उच्च अप्रत्याशितता (unpredictability) और महत्वपूर्ण डाउनसाइड रिस्क की ओर इशारा किया है, और चेतावनी दी है कि उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष, कमोडिटी की कीमतों में अस्थिरता और सख्त वित्तीय स्थितियों (tighter financial conditions) के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील हैं। RBI की यह चिंता कि सप्लाई शॉक डिमांड शॉक में बदल सकते हैं, एक बड़ा कारक बन सकती है, जो उपभोक्ता खर्च और निवेश को कम कर सकती है और आर्थिक मंदी को बढ़ा सकती है।
नीतिगत प्रतिक्रियाएं और भविष्य का दृष्टिकोण
भारत एनर्जी शॉक (energy shock) के प्रभाव को कम करने के लिए कदम उठा रहा है। सरकार ने उपभोक्ताओं को बढ़ती ईंधन कीमतों से बचाने के लिए एक्साइज ड्यूटी (excise duties) कम कर दी है। इसने ईंधन निर्यात पर ड्यूटी भी बढ़ा दी है और तेल उत्पादकों और रिफाइनरों पर विंडफॉल टैक्स (windfall tax) लगाया है। RBI की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (monetary policy committee) ने अप्रैल की बैठक में इन बढ़ते जोखिमों के प्रति 'वेट-एंड-वॉच' (wait-and-watch) दृष्टिकोण को प्राथमिकता दी। बुनियादी ढांचे (infrastructure) और सुधारों (reforms) पर सरकार का निरंतर ध्यान आर्थिक गतिविधि का समर्थन करेगा। हालांकि, इन उपायों की प्रभावशीलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि पश्चिम एशिया का संघर्ष कितने लंबे समय तक और कितना तीव्र रहता है, और नीतिगत प्रतिक्रियाएं इन्फ्लेशन और मांग को कितनी अच्छी तरह प्रबंधित करती हैं।
