ख़तरनाक संकेत: गवर्नेंस की खामियां बन सकती हैं बड़ी समस्या
RBI के डिप्टी गवर्नर जे. स्वामीनाथन ने एक महत्वपूर्ण बात पर जोर दिया है – फाइनेंसियल सिस्टम में आने वाली दिक्कतें या क्राइसिस अक्सर इसलिए नहीं होतीं कि लोगों को जानकारी नहीं है, बल्कि इसलिए होती हैं क्योंकि गवर्नेंस (शासन-प्रशासन) में ही गड़बड़ियां होती हैं। उन्होंने यह भी बताया कि कई बार कंपनियों के अंदर ऐसे इंसेंटिव स्ट्रक्चर (प्रोत्साहन योजनाएं) बना दिए जाते हैं जो कर्मचारियों को किसी भी खतरे के संकेत (Red Flags) को बताने से रोकते हैं या उनकी आवाज़ को अनसुना कर देते हैं।
डिजिटलाइजेशन बढ़ा रहा जोखिम
यह चेतावनी इसलिए अहम है क्योंकि भारत अपने फाइनेंसियल सेक्टर को तेजी से बढ़ा रहा है, खासकर डिजिटलाइजेशन के सहारे। लेकिन, डिप्टी गवर्नर स्वामीनाथन ने आगाह किया है कि अगर मजबूत अनुशासन (Discipline) न हो, तो यह तेजी और डिजिटल स्केलिंग (Digital Scaling) जोखिमों को कई गुना बढ़ा सकती है। अगर किसी प्रोडक्ट का डिजाइन खराब हो, कंट्रोल सिस्टम कमजोर हो, या इंसेंटिव्स सही न हों, तो लाखों लोग एक साथ प्रभावित हो सकते हैं।
'विकसित भारत' के लक्ष्य पर असर
देश के लिए 2047 तक 'विकसित भारत' (Viksit Bharat) बनने के बड़े लक्ष्य में फाइनेंसियल सेक्टर की मजबूत भूमिका है। ऐसे में, नेतृत्व (Leadership) की जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि बढ़ती जटिलताओं के बीच भी सिस्टम स्थिर रहे।
इंसेंटिव्स का खेल और छिपी हुई गड़बड़ियां
स्वामीनाथन ने इस बात पर फिर से जोर दिया कि फाइनेंसियल सिस्टम में अक्सर देखा जाता है कि लोग गलतियों को छुपाते हैं या खतरे के संकेतों को नजरअंदाज करते हैं, खासकर जब उन्हें सीधे तौर पर फायदा दिख रहा हो। नया और तेज गति वाला फाइनेंसियल सिस्टम, जो रातों-रात लाखों लोगों तक पहुंच सकता है, अगर उसमें डिजाइन, कंट्रोल या इंसेंटिव्स की कोई भी गड़बड़ हुई, तो वह एक बड़ी समस्या बन जाती है।
बाहरी दबाव और रेगुलेटरी एक्शन
'विकसित भारत' के लक्ष्य को पाने के लिए एक मजबूत फाइनेंसियल इकोसिस्टम जरूरी है। लेकिन, देश की ग्रोथ पर अंदरूनी गवर्नेंस की खामियों के साथ-साथ बाहरी भू-राजनीतिक (Geopolitical) दबावों का भी असर पड़ सकता है। उदाहरण के लिए, पश्चिम एशिया में चल रहा संकट शिपिंग लागत और कच्चे तेल की कीमतों को बढ़ाकर उन सेक्टर्स को प्रभावित कर सकता है जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर निर्भर हैं। यह अप्रत्यक्ष रूप से फाइनेंसियल संस्थानों को भी प्रभावित कर सकता है। ऐतिहासिक तौर पर, RBI की गवर्नेंस मुद्दों पर चेतावनियों के बाद अक्सर रेगुलेटरी एक्शन तेज हुआ है।
आगे का रास्ता: गवर्नेंस या गड़बड़?
आगे चलकर, भारतीय फाइनेंसियल सेक्टर का प्रदर्शन दो तरह का हो सकता है: कुछ ऐसे संस्थान जो RBI के निर्देशों के अनुसार अपनी गवर्नेंस और रिस्क मैनेजमेंट (Risk Management) को मजबूत करेंगे, और दूसरे जो पुरानी समस्याओं और गलत इंसेंटिव्स से जूझते रहेंगे। देश के विकास के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए यह बहुत जरूरी है कि मजबूत लीडरशिप और कंट्रोल सिस्टम को विकास का आधार बनाया जाए, न कि उन्हें बाद में सोचा जाए। बाजार इस बात पर बारीकी से नजर रखेगा कि कौन से संस्थान अनुशासनात्मकता और पारदर्शिता लाने में कामयाब होते हैं।