RBI का बड़ा दांव: विदेशी कर्ज का रास्ता खुला
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने फरवरी 2026 में अपने एक्सटर्नल कमर्शियल बोरिंग (ECB) फ्रेमवर्क में बड़े बदलाव किए हैं। यह भारतीय कॉरपोरेट सेक्टर को ग्लोबल कैपिटल मार्केट से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। नए नियमों के तहत, कंपनियां अब अपनी नेट वर्थ के 300% या $1 बिलियन (जो भी ज्यादा हो), पहले से काफी ज्यादा रकम का विदेशी कर्ज ले सकेंगी। सबसे खास बात यह है कि RBI ने ऑल-इन-कॉस्ट कैप्स को हटा दिया है, जिससे कर्ज लेने की लागत अब मौजूदा मार्केट रेट के हिसाब से तय होगी। इससे कंपनियों को फंड जुटाने में काफी सहूलियत मिलेगी। इस उदारीकरण से विदेशी फंड जुटाने में तेजी आने की उम्मीद है, जो निफ्टी 50 की हालिया बढ़त का भी साथ देगा और भारतीय कंपनियों के लिए पैसे का एक बड़ा जरिया तैयार करेगा।
M&A और LBO के लिए खुलेंगे नए रास्ते
यह नए ECB नियम भारतीय मर्जर एंड एक्वीजीशन (M&A) और लीवरेज्ड बायआउट (LBO) मार्केट के लिए एक '1991 मोमेंट' साबित हो सकते हैं। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि प्राइसिंग कैप्स हटने और कर्ज देने वाले व लेने वाले ज्यादा होने से, अधिग्रहण (acquisition) के लिए फाइनेंसिंग आसान हो जाएगी। इंफ्रास्ट्रक्चर, रिन्यूएबल एनर्जी और बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के लिए यह खास तौर पर फायदेमंद होगा, जिन्हें अपने विस्तार और रणनीतिक सौदों के लिए आसानी से बड़ा विदेशी फंड मिल सकेगा। उदाहरण के लिए, इंडियन रेलवे फाइनेंस कॉर्पोरेशन (IRFC), जिसकी मार्केट कैप करीब ₹1.48 ट्रिलियन है, इस नई व्यवस्था का इस्तेमाल अपने इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंसिंग के लिए कर सकती है। इसी तरह, श्रीराम फाइनेंस, जिसकी मार्केट कैप लगभग ₹2.03 ट्रिलियन है, को भी अपने फाइनेंसिंग ऑपरेशंस के लिए बेहतर मौके मिल सकते हैं। विदेशी पूंजी के इस प्रवाह से डोमेस्टिक लिक्विडिटी पर दबाव कम होगा और भारतीय कंपनियां पारंपरिक बैंकिंग चैनलों से हटकर दूसरे तरीकों से भी फंड जुटा पाएंगी।
करेंसी का रिस्क और हेजिंग की जरूरत
हालांकि, विदेशी कर्ज आसानी से मिलने का यह मतलब नहीं कि सब कुछ आसान ही होगा। विदेशी कर्ज लेने की बढ़ी हुई सुविधा के साथ करेंसी (मुद्रा) में उतार-चढ़ाव का रिस्क भी बढ़ जाता है। इंडियन रुपये की गिरती वैल्यू उधार लेने वालों के लिए चिंता का सबब बन सकती है, इसलिए नुकसान से बचने और उधार की लागत को कंट्रोल करने के लिए मजबूत हेजिंग (hedging) स्ट्रेटेजी बनाना बहुत जरूरी होगा। वैसे तो लागत कैप हटने से फ्लेक्सिबिलिटी मिलेगी, लेकिन अगर ग्लोबल ब्याज दरें बढ़ती हैं तो कमजोर कंपनियों को ज्यादा महंगा कर्ज लेना पड़ सकता है। इसलिए, कंपनियों को सावधानी से रिस्क मैनेजमेंट पर ध्यान देना होगा।
RBI की सतर्कता और कुछ कमजोर कड़ियां
ECB फ्रेमवर्क को अंतिम रूप देते हुए RBI ने सिस्टमैटिक रिस्क को लेकर अपनी चिंताएं साफ की हैं। केंद्रीय बैंक ने रियल एस्टेट कंपनियों को ECB फंड देने की इजाजत नहीं दी है और मौजूदा ECB पर इन नए नियमों को लागू करने से भी मना कर दिया है। यह रेगुलेटरी सतर्कता को दर्शाता है। IRFC जैसी कंपनियों के सामने कुछ खास चुनौतियां भी हैं, जैसे कि उनका इंटरेस्ट कवरेज रेशियो कम होना और डेटर डेज़ ज्यादा होना, जो ग्लोबल फाइनेंस मार्केट में नेविगेट करना मुश्किल बना सकता है। श्रीराम फाइनेंस के सामने भी कम इंटरेस्ट कवरेज रेशियो जैसी दिक्कतें हैं। विदेशी मुद्रा-आधारित कर्ज पर ज्यादा निर्भरता कंपनियों को ग्लोबल इकोनॉमिक शॉक और करेंसी की अस्थिरता के प्रति ज्यादा संवेदनशील बनाती है, जिसके लिए सभी उधारकर्ताओं को बेहतर रिस्क मिटिगेशन की जरूरत होगी।
आगे की राह: ग्लोबल इंटीग्रेशन और सावधानी भरी ग्रोथ
नए ECB नियमों से भारतीय कैपिटल मार्केट का ग्लोबल फाइनेंस के साथ इंटीग्रेशन बढ़ेगा। इससे भारतीय कंपनियों की कॉम्पिटिटिवनेस (competitiveness) भी बढ़ेगी और वे डोमेस्टिक बैंक क्रेडिट पर अपनी निर्भरता कम कर पाएंगी। एनालिस्ट्स का अनुमान है कि बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर और मैन्युफैक्चरिंग प्रोजेक्ट्स के लिए फंडिंग तेज होगी, जो देश के आर्थिक विकास की रणनीतियों के अनुरूप है। यह एक स्ट्रक्चरल शिफ्ट (structural shift) है, जो भारतीय व्यवसायों को ग्रोथ और रणनीतिक पहलों के लिए बड़े और विविध कैपिटल पूल तक पहुंचने में सक्षम बनाएगा। हालांकि, इस बढ़ी हुई ग्लोबल फाइनेंस की पहुंच का फायदा उठाते हुए, कंपनियों को इससे जुड़े करेंसी रिस्क और एक्सटर्नल डेट लेवल का समझदारी से प्रबंधन करना सबसे अहम होगा।