भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) रुपये को स्थिर रखने के लिए लगातार विदेशी मुद्रा बाजार में सक्रिय है। अप्रैल महीने में, RBI ने रुपये में गिरावट को थामने के लिए **$8.944 अरब** की बिकवाली की। यह मार्च में की गई **$9.758 अरब** की बिकवाली के बाद एक और बड़ा कदम है।
क्या हुआ?
RBI ने भारतीय रुपये को सहारा देने के अपने प्रयासों को जारी रखते हुए, अप्रैल में स्पॉट फॉरेन एक्सचेंज मार्केट में $8.944 अरब बेचे। यह मार्च के $9.758 अरब के बड़े दखल के बाद हुआ है। RBI की मासिक बुलेटिन के अनुसार, इस दौरान केंद्रीय बैंक ने $16.225 अरब विदेशी मुद्रा खरीदी, लेकिन $25.169 अरब बेच दी, ताकि करेंसी की अस्थिरता को नियंत्रित किया जा सके।
कॉर्पोरेट इंडिया पर असर
करेंसी में उतार-चढ़ाव का विभिन्न सेक्टर्स की प्रॉफिटेबिलिटी पर सीधा असर पड़ता है। जब रुपया दबाव में होता है, तो कच्चे माल का आयात करने वाली कंपनियों, जैसे ऑयल मार्केटिंग फर्म, केमिकल प्रोड्यूसर्स और इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माताओं को इनपुट लागत बढ़ने का सामना करना पड़ता है, जिससे उनके प्रॉफिट मार्जिन पर असर पड़ सकता है। वहीं, दूसरी ओर, एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड सेक्टर्स जैसे कि आईटी (IT) और फार्मा को कमजोर रुपये का फायदा होता है, क्योंकि विदेशी मुद्रा में उनकी कमाई को अधिक रुपये मिलते हैं।
रुपया दबाव में क्यों है?
RBI का यह लगातार दखल रुपये पर बने दबाव को दर्शाता है। केंद्रीय बैंक ने बताया है कि अप्रैल और मई के दौरान रुपये में कमजोरी के पीछे मुख्य कारण भू-राजनीतिक तनाव और फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट (FPI) का लगातार आउटफ्लो रहा है। जब विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकालते हैं, तो वे रुपया-आधारित एसेट्स बेचते हैं और डॉलर में कन्वर्ट करते हैं, जिससे घरेलू करेंसी पर दबाव बनता है।
स्थिरीकरण के संकेत
हालांकि, फाइनेंशियल ईयर के पहले दो महीनों में केंद्रीय बैंक की महत्वपूर्ण गतिविधियों के बाद, अब कुछ बदलाव के शुरुआती संकेत मिल रहे हैं। RBI ने नोट किया है कि जून में रुपये में सुधार के संकेत दिखने लगे हैं। इस रिकवरी को अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में नरमी से भी सहारा मिल रहा है, जिससे इम्पोर्ट बिल और डॉलर की मांग कम हुई है। साथ ही, लिक्विडिटी को बेहतर बनाने और करेंसी को स्थिर करने के लिए कुछ खास कैपिटल फ्लो मेजर्स भी उठाए गए हैं। 19 जून तक, मार्च के अंत की तुलना में रुपये में 0.2% का सुधार देखा गया। 22 जून को, रुपया 94.63 पर बंद हुआ, जबकि 31 मार्च को यह 94.84 था।
निवेशकों को क्या ट्रैक करना चाहिए?
निवेशकों और मार्केट पार्टिसिपेंट्स को कुछ मुख्य फैक्टर्स पर नज़र रखनी चाहिए जो RBI के एक्शन और करेंसी की स्थिरता को प्रभावित करते हैं:
- क्रूड ऑयल की कीमतें: भारत एक बड़ा ऑयल इम्पोर्टर है, इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल से रुपया कमजोर होता है, जिससे इम्पोर्ट के लिए अधिक डॉलर की आवश्यकता होती है।
- फॉरेन पोर्टफोलियो फ्लो: FPIs का लगातार आउटफ्लो करेंसी में स्ट्रक्चरल कमजोरी पैदा करता है। इन फ्लो में रिवर्सल अक्सर रुपये की स्थिरता के लिए एक पॉजिटिव संकेत होता है।
- RBI का फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व: RBI के दखल की फ्रीक्वेंसी और वॉल्यूम, रुपये पर दबाव के स्तर के महत्वपूर्ण संकेतक बने हुए हैं।
- इंफ्लेशन ट्रेंड्स: वैश्विक साथियों की तुलना में उच्च घरेलू इंफ्लेशन, लंबे समय में करेंसी वैल्यूएशन को प्रभावित कर सकता है।
