RBI के हस्तक्षेप से रुपये में आई तेजी
आज शुरुआती कारोबार में भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 96.30 पर खुला, जो पिछले क्लोजिंग लेवल से 52 पैसे का बड़ा उछाल है।
RBI की सोची-समझी डॉलर बिक्री
बाजार के जानकारों का कहना है कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने फॉरेन मार्केट में डॉलर बेचे हैं। इस कदम का मकसद रुपये के गिरते भाव को रोकना और उसकी कीमत को मजबूत करना है। यह RBI की करेंसी की स्थिरता बनाए रखने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। ऐतिहासिक रूप से, RBI ने रुपये की गिरावट को संभालने के लिए डॉलर बेचे हैं, जिससे मार्केट से रुपया वापस लिया जाता है और घरेलू करेंसी मजबूत होती है। RBI का लक्ष्य एक निश्चित एक्सचेंज रेट को बनाए रखने के बजाय तेज उतार-चढ़ाव को रोकना है, और वह रणनीतिक हस्तक्षेप से इस लक्ष्य को हासिल करने की कोशिश करता है।
रुपये पर बढ़ता दबाव और पिछला प्रदर्शन
यह हस्तक्षेप ऐसे समय में हुआ है जब भारतीय रुपये पर लगातार दबाव बना हुआ है। इस साल रुपया 7% से ज्यादा टूट चुका है, और यह एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली करेंसी बन गया था। भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता जैसे कई कारण रुपये की कमजोरी के पीछे रहे हैं। 2025 में, रुपये में काफी उतार-चढ़ाव देखा गया, कई बार यह अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 90 के पार गया और साल के अंत तक 5.12% की गिरावट के साथ एशिया की सबसे खराब करेंसी के रूप में बंद हुआ। USD/INR एक्सचेंज रेट दिसंबर 2025 में 91.38 के ऑल-टाइम हाई पर पहुंच गया था। मई 2026 में, भारतीय रुपया USD के मुकाबले 96.64 पर आ गया था, जो मार्च 2026 के बाद सबसे निचला स्तर था, और पिछले 12 महीनों में यह 12.92% बढ़ गया था। RBI के हस्तक्षेपों ने, हालांकि अल्पावधि में स्थिरता प्रदान की है, बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी सरप्लस को कम कर दिया है।
लगातार दबाव और रिजर्व में कमी
RBI के हस्तक्षेप के बावजूद, रुपये पर अंदरूनी दबाव बना हुआ है। भारत का नेट एनर्जी इम्पोर्टर (Net Energy Importer) होना, बढ़ते तेल की कीमतों के प्रति उसकी भेद्यता को बढ़ाता है, जिससे ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit) बढ़ता है और फ्यूल सब्सिडी (Fuel Subsidy) की लागत बढ़ जाती है। वैश्विक निवेशकों ने भारतीय इक्विटी (Equity) से भी बड़ी मात्रा में पैसा निकाला है, जिसने करेंसी पर अतिरिक्त दबाव डाला है। RBI द्वारा डॉलर की बिक्री के जरिए रुपये का आक्रामक बचाव करने से फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व (Foreign Exchange Reserves) में उल्लेखनीय कमी आई है। उदाहरण के लिए, अगस्त 2025 के एक सप्ताह में स्पॉट डॉलर बिक्री के कारण रिजर्व $9.3 बिलियन कम हो गए थे। हालांकि रिजर्व अभी भी काफी हैं और 11 महीने से अधिक के इम्पोर्ट (Import) को कवर कर सकते हैं, लगातार निकासी भारत की मैक्रो स्टेबिलिटी (Macro Stability) की कहानी को प्रभावित कर सकती है। इसके अलावा, कमजोर रुपया इम्पोर्टेड इन्फ्लेशन (Imported Inflation) को बढ़ाता है, खासकर ऊर्जा और अन्य आवश्यक वस्तुओं के लिए, जिसका असर उपभोक्ता कीमतों पर पड़ सकता है।
भविष्य का अनुमान
विश्लेषकों का अनुमान है कि रुपये की चाल वैश्विक अस्थिरता और बाहरी कारकों से प्रभावित होती रहेगी। RBI की हस्तक्षेप रणनीति का मुख्य फोकस अस्थिरता को कम करना है, न कि किसी विशेष विनिमय दर स्तर को लक्षित करना, जिससे बाजार की शक्तियों को महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की अनुमति मिलती है। इन हस्तक्षेपों की प्रभावशीलता और स्थिरता पर ट्रेडर्स और निवेशकों की बारीकी से नजर रहेगी। ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स (Trading Economics) के ग्लोबल मैक्रो मॉडल (Global Macro Models) और विश्लेषकों की उम्मीदों के अनुसार, भारतीय रुपया चालू तिमाही के अंत तक 95.77 और 12 महीने में 94.23 पर ट्रेड करने की उम्मीद है।
