शानदार 'स्वीट स्पॉट' में भारतीय अर्थव्यवस्था: RBI गवर्नर का बड़ा बयान
RBI के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भारतीय इकोनॉमी की मौजूदा स्थिति को 'अविश्वसनीय रूप से मजबूत स्वीट स्पॉट' बताया है, जो पिछली उम्मीदों से भी बेहतर है। उनके अनुसार, देश में ग्रोथ की रफ्तार तेज हो रही है और इंफ्लेशन (महंगाई) काबू में है। इसी को देखते हुए, सेंट्रल बैंक ने जीडीपी ग्रोथ के अनुमान को 20 बेसिस पॉइंट्स बढ़ाकर पॉजिटिव कर दिया है। यह बूस्ट यूएस के साथ संभावित ट्रेड एग्रीमेंट जैसे फेवरेबल ट्रेड एंगेजमेंट्स का भी नतीजा है। गवर्नर मल्होत्रा ने यह भी साफ कर दिया है कि ब्याज लागतें लंबे समय तक low बनी रहेंगी, ताकि मॉनेटरी ईजिंग का पूरा फायदा क्रेडिट मार्केट्स और बिजनेसेज को मिल सके। हालांकि, बेस इफेक्ट्स और प्रेशियस मेटल्स जैसी कमोडिटी प्राइसेस के चलते हेडलाइन इंफ्लेशन में थोड़े उतार-चढ़ाव की आशंका है, लेकिन कोर इंफ्लेशन दबाव में है। RBI ने पॉलिसी रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रखा है और 'न्यूट्रल' स्टान्स बनाए रखा है।
सरकारी उधारी: RBI का भरोसा, बाजार की चिंता
इतने पॉजिटिव संकेतों के बावजूद, सरकारी उधारी के बड़े प्लान्स ने फाइनेंशियल मार्केट्स में थोड़ी चिंता बढ़ा दी है। फाइनेंशियल ईयर 2027 के लिए ग्रॉस बोरिंग का टारगेट ₹17.2 लाख करोड़ रखा गया है। गवर्नर मल्होत्रा ने निवेशकों को आश्वस्त करते हुए कहा कि यह रकम बड़े पैमाने पर रीपेमेंट की है, और नेट बोरिंग में सिर्फ ₹20,000 करोड़ की ही बढ़ोतरी है। RBI ने यह भी भरोसा दिलाया है कि सिस्टम में लिक्विडिटी की कोई कमी नहीं होने दी जाएगी। फिर भी, बड़े ग्रॉस नंबर के ऐलान के बाद, 10-साल के बेंचमार्क सरकारी बॉन्ड यील्ड में 10 बेसिस पॉइंट्स तक का उछाल देखा गया। यह रिएक्शन 'क्राउडिंग आउट' इफेक्ट्स को लेकर निवेशकों की चिंता को दिखाता है, जहां भारी सरकारी इश्यूएंस प्राइवेट सेक्टर के लिए फंड की उपलब्धता को कम कर सकता है।
ट्रेड डील्स और रिफॉर्म्स: निवेश को बूस्ट
हालिया द्विपक्षीय समझौतों ने भी सेंटीमेंट को मजबूत किया है। यूएस-इंडिया ट्रेड डील से भारतीय एक्सपोर्ट्स पर टैरिफ 50% से घटकर 18% हो जाने की उम्मीद है, जिससे एक्सपोर्ट कॉम्पिटिटिवनेस बढ़ेगी। इसके अलावा, इंश्योरेंस सेक्टर में 100% फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) को मंजूरी मिल गई है, जो 5 फरवरी 2026 से लागू होगी। इस रिफॉर्म से लॉन्ग-टर्म फॉरेन कैपिटल और एक्सपर्टाइज का बड़ा फ्लो आने की उम्मीद है। डेटा सेंटर्स के लिए टैक्स इंसेंटिव्स जैसे सरकारी कदम भी निवेश को बढ़ावा देंगे। बैंकिंग सेक्टर की बात करें तो, RBI क्रेडिट-डिपॉजिट रेशियो को साइक्लिकल ट्रेंड मान रहा है और ब्रॉडर फाइनेंशियल स्टेबिलिटी पर फोकस कर रहा है।
ग्लोबल रिस्क और फॉरेक्स रिजर्व में बदलाव
हालांकि भारतीय इकोनॉमी मजबूत दिख रही है, लेकिन ग्लोबल इकोनॉमिक सिचुएशन थोड़ी कॉम्प्लिकेटेड है। IMF के अनुमानों के मुताबिक, एडवांस्ड इकोनॉमीज में ग्रोथ धीमी रहने की संभावना है, जबकि इमर्जिंग मार्केट्स, भारत सहित, 2026 में ग्लोबल ग्रोथ के मुख्य इंजन होंगे। वहीं, जियोपॉलिटिकल टेंशन और ट्रेड पॉलिसी के बदलाव ग्लोबल आउटलुक के लिए जोखिम बने हुए हैं। यूएस फेडरल रिजर्व के रेट कट साइकल जारी रहने की उम्मीद है। इसी के साथ, एक बड़ा बदलाव यह भी दिखा है कि भारत के फॉरेक्स रिजर्व में यूएस ट्रेज़रीज़ की होल्डिंग्स घटी हैं। नवंबर 2025 तक ये घटकर $174 बिलियन रह गई हैं, जो कुल रिजर्व का लगभग एक-तिहाई है। यह कदम दूसरे बड़े देशों के कदमों के अनुरूप है।