व्यापार में रुपये का जलवा, पर क्यों है विरोधाभास?
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की रुपये को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा बनाने की कोशिशें रंग ला रही हैं। आयात भुगतान (Import Settlements) में INR का इस्तेमाल 41% से ज्यादा बढ़ गया है, जो भारतीय कंपनियों के लिए क्रॉस-बॉर्डर लेनदेन को आसान बना रहा है। इसका मुख्य मकसद डॉलर पर निर्भरता कम करके बाहरी झटकों से बचना है। लेकिन, डॉलर के मुकाबले रुपये की लगातार गिरती कीमत बताती है कि सिर्फ व्यापारिक चालान (Trade Invoicing) से देश वैश्विक तरलता (Global Liquidity) और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (Foreign Portfolio Allocations) में आ रहे बड़े बदलावों से नहीं बच सकता।
कैपिटल अकाउंट की उलझनें
व्यापार में INR के बढ़ते इस्तेमाल और रुपये की कमजोर होती कीमत के बीच का यह अंतर, अंतर्राष्ट्रीयकरण की रणनीति की सीमाओं को उजागर करता है। व्यापार प्रवाह (Trade Flows) तो बढ़ रहे हैं, लेकिन रुपया अभी भी कैपिटल फ्लो (Capital Flows) के नेट बैलेंस पर टिका है। चीनी युआन (Chinese Yuan) की तरह, जिसका इस्तेमाल बड़े और खुले कैपिटल मार्केट के कारण बढ़ा, रुपये की प्रगति अभी भी सीमित कैपिटल अकाउंट कनवर्टिबिलिटी (Capital Account Convertibility) के कारण अटकी हुई है। बाजार की नजर RBI के उन हस्तक्षेपों पर है जो रुपये को बचाने के लिए बार-बार करने पड़ रहे हैं। इससे विदेशी मुद्रा भंडार पर निर्भरता कम करने का लक्ष्य और मुश्किल हो जाता है। RBI एक तरफ आर्थिक संप्रभुता (Economic Sovereignty) की ओर बढ़ रहा है, तो दूसरी ओर वैश्विक ब्याज दरों (Global Interest Rate Differentials) के भारत के खिलाफ जाने के कारण निवेशकों का भरोसा बनाए रखने की चुनौती भी है।
जोखिम की घंटी: संरचनात्मक कमजोरियां
कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि रुपये के अंतर्राष्ट्रीयकरण की तेज रफ्तार एक खतरनाक जाल बना सकती है। अगर भारतीय कंपनियां कमजोर रुपये के दौर में INR में व्यापार करेंगी, तो उन्हें विदेशी खरीदार ढूंढने में मुश्किल हो सकती है, जिससे छोटे और मध्यम उद्योगों (SMEs) के लिए लेनदेन महंगा हो सकता है। इसके अलावा, द्विपक्षीय व्यापार समझौतों (Bilateral Trade Agreements) पर निर्भरता एक कमजोर ढांचा तैयार करती है; अगर भू-राजनीतिक समीकरण बदलते हैं, तो यह इंफ्रास्ट्रक्चर बेकार हो सकता है। ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficits) के बने रहने का मतलब है कि भारत को अपना खाता संतुलित करने के लिए अभी भी बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा की जरूरत है, जिससे वह उसी डॉलर की अस्थिरता के संपर्क में है, जिससे वह बचना चाहता है। जब तक बॉन्ड मार्केट में विदेशी निवेश नहीं बढ़ता, तब तक रुपया वैश्विक व्यापार में एक छोटी भूमिका ही निभाएगा, न कि मूल्य के मुख्य भंडार के रूप में।
भविष्य की राह
RBI संभवतः रुपये को मल्टीलेटरल क्लियरिंग सिस्टम (Multilateral Clearing Systems) में शामिल करने पर जोर देगा ताकि पारंपरिक SWIFT सिस्टम की बाधाओं को पार किया जा सके। अगले फाइनेंशियल ईयर में इस नीति की सफलता सिर्फ व्यापारिक मात्रा से नहीं, बल्कि एक ऐसे ऑफ-शोर मार्केट के विकास से मापी जाएगी जो सही प्राइस डिस्कवरी (Price Discovery) और हेजिंग (Hedging) का समर्थन कर सके। जैसे-जैसे अन्य उभरते बाजार (Emerging Markets) भी अपनी स्थानीय मुद्राओं के ढांचे को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं, भारत कुछ व्यापारिक मार्गों में पहला कदम उठाने का फायदा उठा सकता है, बशर्ते वह अपनी राजकोषीय दबाव (Fiscal Pressure) को नियंत्रित कर सके।
