RBI का रिकॉर्ड डिविडेंड: सरकार को ₹3 लाख करोड़ से ज्यादा की मदद, जानें क्या है इसके मायने

ECONOMY
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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
RBI का रिकॉर्ड डिविडेंड: सरकार को ₹3 लाख करोड़ से ज्यादा की मदद, जानें क्या है इसके मायने
Overview

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) इस बार सरकार को रिकॉर्ड डिविडेंड (Dividend) देने जा रहा है, जो देश के खजाने के लिए एक बड़ी राहत है। उम्मीद है कि यह भुगतान पिछले साल के **₹2.69 लाख करोड़** के रिकॉर्ड को भी पार कर जाएगा। यह राशि सरकार को आर्थिक चुनौतियों से निपटने में महत्वपूर्ण मदद करेगी, खासकर मध्य पूर्व संकट (Middle East crisis) के बीच।

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रिकॉर्ड भुगतान के पीछे की वजह

RBI के इस बड़े डिविडेंड भुगतान के पीछे मुख्य कारण फॉरेन एक्सचेंज (Forex) ऑपरेशन्स में शानदार कमाई और पब्लिक सेक्टर बैंकों (PSBs) का मजबूत प्रदर्शन है। डॉलर के मुकाबले रुपये को संभालने के लिए RBI की तरफ से की गई डॉलर की बिक्री से भारी मुनाफा हुआ है। इस कमाई और बढ़े हुए ब्याज से RBI की मुनाफाखोरों (profitability) में इजाफा हुआ है।

SBI रिसर्च के मुताबिक, RBI की तरफ से ग्रॉस डॉलर की बिक्री में बड़ी बढ़ोतरी देखी गई है। यह वित्तीय मजबूती RBI के इकोनॉमिक कैपिटल फ्रेमवर्क (ECF) के तहत आती है, जो सरप्लस को तय करता है।

वहीं, पब्लिक सेक्टर बैंकों (PSBs) ने फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में ₹1.98 लाख करोड़ का ऐतिहासिक नेट प्रॉफिट दर्ज किया है, जो पिछले साल के मुकाबले 11.1% ज्यादा है। यह लगातार चौथा साल है जब PSBs ने इतना बड़ा मुनाफा कमाया है। बेहतर एसेट क्वालिटी और क्रेडिट ग्रोथ की वजह से PSBs ने सरकारी बैंकों की कमाई के अनुमान को बढ़ाया है।

आर्थिक चुनौतियों में सरकारी निर्भरता

आने वाला डिविडेंड भुगतान सरकार की फाइनेंशियल ईयर 2026-27 की रणनीति के लिए बेहद अहम है। सरकार को RBI और PSBs से मिलाकर कुल ₹3.16 लाख करोड़ का डिविडेंड और सरप्लस मिलने का अनुमान है। यह पैसा तब महत्वपूर्ण हो जाता है जब भारत मध्य पूर्व संकट जैसी आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। इस संकट से तेल की कीमतें ऊंची रह सकती हैं, जिससे FY27 में GDP ग्रोथ 0.6% तक कम हो सकती है और महंगाई बढ़ सकती है।

सरकार का गैर-टैक्स रेवेन्यू (non-tax revenue) पर इस तरह निर्भर रहना बजट प्लानिंग में साफ दिखता है। हालांकि, इस पर ज्यादा निर्भरता चिंता का विषय है। लगातार भारी भुगतान RBI के कैपिटल रिजर्व पर दबाव डाल सकता है और उसकी कीमत स्थिरता (price stability) व वित्तीय स्वतंत्रता (financial independence) जैसे लक्ष्यों से टकरा सकता है।

केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता पर सवाल

RBI के सरप्लस ट्रांसफर पर सरकार की इतनी निर्भरता केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता के लिए एक बड़ा जोखिम पैदा करती है। जहां सरकार इन भुगतानों को एक वित्तीय सहारा मान रही है, वहीं आलोचकों को डर है कि यह RBI पर ऐसे फैसले लेने का दबाव बना सकता है जो सरकार के लिए फायदेमंद हों, बजाय इसके कि वह अपनी मुख्य जिम्मेदारियों जैसे कीमत स्थिरता और वित्तीय क्षेत्र की निगरानी पर ध्यान दे।

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इस तरह की अचानक कमाई से अल्पकालिक बजट दबाव तो कम हो जाता है, लेकिन यह एक भरोसेमंद वित्तीय साधन नहीं है और केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता (autonomy) और विश्वसनीयता (credibility) को नुकसान पहुंचा सकता है। RBI का इकोनॉमिक कैपिटल फ्रेमवर्क (ECF) और कंटिंजेंट रिस्क बफर (CRB) इसे अप्रत्याशित संकटों से निपटने में मदद करते हैं। CRB की रेंज अब 4.5% से 7.5% के बीच है। लेकिन, लगातार ऊंची भुगतान की उम्मीदें RBI पर लंबे समय की स्थिरता के बजाय तत्काल सरकारी जरूरतों को प्राथमिकता देने का दबाव बना सकती हैं।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.