RBI का बड़ा कदम: बैंकों में ₹84,582 करोड़ का इंजेक्शन, जानिए क्यों, भले ही सिस्टम में है सरप्लस

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
RBI का बड़ा कदम: बैंकों में ₹84,582 करोड़ का इंजेक्शन, जानिए क्यों, भले ही सिस्टम में है सरप्लस
Overview

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने सोमवार को दो वेरिएबल रेट रेपो (VRR) ऑक्शन के जरिए बैंकिंग सिस्टम में **₹84,582 करोड़** की लिक्विडिटी डाली है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब सिस्टम में **₹1.27 लाख करोड़** का अनुमानित सरप्लस है, लेकिन RBI का लक्ष्य शॉर्ट-टर्म इंटरेस्ट रेट्स को पॉलिसी रेपो रेट के करीब रखना है।

RBI का खास ऑपरेशन: क्यों डाली ₹84,582 करोड़ की लिक्विडिटी?

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने सोमवार को वेरिएबल रेट रेपो (VRR) ऑक्शन के ज़रिए बैंकिंग सिस्टम में ₹84,582 करोड़ की अल्पकालिक लिक्विडिटी (तरलता) इंजेक्ट की। इसमें पहले तीन-दिवसीय ऑपरेशन में ₹50,001 करोड़ डाले गए, जिसकी कट-ऑफ रेट 5.34% और वेटेड एवरेज रेट 5.44% रही। वहीं, दूसरे ऑक्शन में ₹34,581 करोड़ दिए गए, जिसमें कट-ऑफ रेट 5.26% और वेटेड एवरेज रेट 5.30% दर्ज की गई।

सरप्लस के बावजूद फंड क्यों डाले?

यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब 27 मार्च तक सिस्टम में ₹1.27 लाख करोड़ का मोटा कैश सरप्लस होने का अनुमान है। दरअसल, एडवांस टैक्स और जीएसटी (GST) जैसे भुगतानों के कारण सिस्टम में कभी-कभी नकदी की कमी (short-term cash tightness) हो जाती है। RBI इन अस्थायी असंतुलनों को दूर करने और यह सुनिश्चित करने के लिए लक्षित VRR ऑक्शन का उपयोग कर रहा है कि जरूरत के हिसाब से फंड उपलब्ध हो और मनी मार्केट रेट्स में कोई बड़ी अस्थिरता न आए।

शॉर्ट-टर्म ब्याज दरों पर RBI का फोकस

RBI का मुख्य उद्देश्य शॉर्ट-टर्म इंटरेस्ट रेट्स, जैसे कि वेटेड एवरेज कॉल मनी रेट, को अपने पॉलिसी रेपो रेट के करीब रखना है। VRR ऑक्शन के ज़रिए फंड्स को पॉलिसी रेट के आसपास की दरों पर उपलब्ध कराकर, RBI बैंकिंग सिस्टम की उधारी लागत को निर्देशित करता है। इससे मनी मार्केट की स्थिति RBI की मौद्रिक नीति के अनुरूप बनी रहती है।

व्यापक लिक्विडिटी मैनेजमेंट

इन रेपो ऑपरेशन्स के अलावा, RBI ओपन मार्केट ऑपरेशन्स (OMOs) जैसे टूल्स से भी लिक्विडिटी को मैनेज करता है, जिसके तहत वह सरकारी सिक्योरिटीज की खरीद-बिक्री करता है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) फ्लो और फॉरेन एक्सचेंज ऑपरेशन्स भी सिस्टम की लिक्विडिटी को प्रभावित करते हैं, जिन पर RBI लगातार नज़र रखता है।

बैंकों की फंडिंग चुनौतियां

RBI के प्रयासों के बावजूद, बैंकों को फंडिंग को लेकर कुछ दबावों का सामना करना पड़ता है। मजबूत क्रेडिट ग्रोथ बैलेंस शीट पर दबाव डाल सकती है, खासकर अगर यह केवल डिपॉजिट के बजाय लिक्विडिटी का उपयोग करके फंड की गई हो। डिपॉजिट ग्रोथ में संरचनात्मक चुनौती, जैसा कि CASA रेश्यो में गिरावट से पता चलता है, बैंकों की फंडिंग लागत बढ़ाती है और उन्हें महंगी देनदारियों पर निर्भर बनाती है। RBI के ये हस्तक्षेप बैंकों को इन स्थितियों से निपटने और पर्याप्त क्रेडिट फ्लो सुनिश्चित करने में मदद करते हैं।

स्थिरता के प्रति प्रतिबद्धता

RBI ने सक्रिय लिक्विडिटी मैनेजमेंट के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। विभिन्न मौद्रिक उपकरणों का लचीले ढंग से उपयोग करके, केंद्रीय बैंक का लक्ष्य बैंकिंग सिस्टम के लिए पर्याप्त फंड सुनिश्चित करना, बाजार की स्थिरता बनाए रखना और भारत के सतत आर्थिक विकास का समर्थन करना है, वो भी वित्तीय स्थिरता से समझौता किए बिना।

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