रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने भारतीय बैंकिंग प्रणाली में तरलता (liquidity) बढ़ाने के लिए 29 दिसंबर को ओपन मार्केट ऑपरेशन (OMO) के ज़रिए सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद करके ₹50,000 करोड़ डाले हैं। इस कदम का उद्देश्य एडवांस टैक्स और जीएसटी भुगतानों से हुए तरलता घाटे (liquidity deficit) को पूरा करना और टिकाऊ तरलता प्रदान करना है। भारतीय बैंकिंग प्रणाली में हाल ही में लगभग ₹62,301.77 करोड़ का तरलता घाटा देखा गया था। यह कमी टैक्स संग्रह से हुए बड़े बहिर्वाह (outflows) के कारण हुई थी, जिससे बैंकों की उधार देने और दैनिक संचालन को प्रबंधित करने की क्षमता पर असर पड़ा था। आरबीआई का यह हस्तक्षेप पर्याप्त तरलता सुनिश्चित करने, वित्तीय स्थिरता बनाए रखने और आर्थिक गतिविधि का समर्थन करने के लिए है।
यह ₹50,000 करोड़ का इंजेक्शन, आरबीआई द्वारा 23 दिसंबर को घोषित एक बड़ी योजना का हिस्सा है। केंद्रीय बैंक ₹2 लाख करोड़ की ओएमओ खरीद नीलामियों की एक श्रृंखला आयोजित करने की योजना बना रहा है। ये नीलामियां चार किश्तों में होंगी, प्रत्येक ₹50,000 करोड़ की, जिसमें अगली नीलामियां 5 जनवरी, 12 जनवरी और 22 जनवरी 2026 को होनी हैं।
29 दिसंबर की नीलामी में, आरबीआई ने विशिष्ट सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद की, जिनमें ₹10,320 करोड़ के 6.79% GS 2029 बॉन्ड, ₹13,733 करोड़ के 7.61% GS 2030 बॉन्ड, ₹9,443 करोड़ के 7.26% GS 2033 बॉन्ड, ₹7,253 करोड़ के 6.79% GS 2034 बॉन्ड, ₹5,505 करोड़ के 6.67% GS 2035 बॉन्ड, और ₹3,746 करोड़ के 7.30% GS 2053 बॉन्ड शामिल थे। विशेष रूप से, 7.18% GS 2037 बॉन्ड के लिए कोई बोली स्वीकार नहीं की गई थी।
ओएमओ खरीद के अलावा, आरबीआई ने USD 10 बिलियन USD/INR बाय/सेल स्वैप नीलामी की भी योजना की घोषणा की है। यह नीलामी 13 जनवरी 2026 को होगी, जिसका कार्यकाल 3 वर्ष का होगा। इसका उद्देश्य प्रणाली में टिकाऊ तरलता डालना और विदेशी मुद्रा बाजार की स्थिरता का प्रबंधन करना है।
आरबीआई का यह सक्रिय तरलता प्रबंधन वित्तीय बाजारों में स्थिरता बनाए रखने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। धन डालकर, केंद्रीय बैंक अल्पकालिक ब्याज दरों में अनुचित वृद्धि को रोकने, क्रेडिट बाजारों के सुचारू कामकाज को सुनिश्चित करने और समग्र आर्थिक सुधार का समर्थन करने का लक्ष्य रखता है। इससे व्यवसायों और उपभोक्ताओं के लिए उधार लेने की लागत स्थिर हो सकती है, जिससे निवेश और उपभोग बढ़ सकता है।
कठिन शब्दों की व्याख्या:
- ओपन मार्केट ऑपरेशन (OMO): यह केंद्रीय बैंक द्वारा अर्थव्यवस्था में तरलता को प्रबंधित करने का एक उपकरण है जिसमें सरकारी प्रतिभूतियों को खरीदा या बेचा जाता है। प्रतिभूतियों को खरीदने से पैसा प्रणाली में आता है, जबकि बेचने से पैसा बाहर जाता है।
- तरलता घाटा (Liquidity Deficit): यह एक ऐसी स्थिति है जहाँ बैंकों के लिए धन की कुल मांग, बैंकिंग प्रणाली में उपलब्ध धन की आपूर्ति से अधिक हो जाती है।
- USD/INR बाय/सेल स्वैप ऑक्शन: यह एक विदेशी मुद्रा परिचालन है जिसमें केंद्रीय बैंक एक निश्चित अवधि के लिए एक मुद्रा (अमेरिकी डॉलर बनाम भारतीय रुपया) को एक साथ खरीदता और बेचता है, जिससे विनिमय दर की अस्थिरता का प्रबंधन करते हुए प्रभावी ढंग से तरलता बढ़ाई या अवशोषित की जाती है।
- सरकारी प्रतिभूतियां (GS): ये केंद्र सरकार द्वारा धन जुटाने के लिए जारी किए जाने वाले ऋण साधन हैं। इन्हें सुरक्षित निवेश माना जाता है।