RBI के इस बड़े फैसले से भारतीय वित्तीय बाज़ार में लिक्विडिटी (liquidity) को काफी सहारा मिलने की उम्मीद है। केंद्रीय बैंक ₹1 लाख करोड़ की सरकारी सिक्योरिटीज (government securities) खरीदेगा, जिसमें ₹50,000 करोड़ की पहली खेप 9 मार्च को और दूसरी ₹50,000 करोड़ की खेप 13 मार्च, 2026 को आएगी। इस कदम से बाज़ार में नकदी का फ्लो बढ़ेगा और यील्ड (yield) पर नीचे की ओर दबाव पड़ने की संभावना है।
यह कार्रवाई RBI की दिसंबर 2025 की मॉनेटरी पॉलिसी (monetary policy) का एक अहम हिस्सा है। गवर्नर संजय मल्होत्रा के नेतृत्व में RBI, वित्तीय वर्ष 2026 के दौरान लिक्विडिटी को सक्रिय रूप से मैनेज कर रहा है। अब तक, 13 फरवरी, 2026 तक, RBI ₹6.39 लाख करोड़ के OMOs कर चुका है, जो सरकार के बॉन्ड इश्यू का एक बड़ा हिस्सा कवर करता है।
फिलहाल, सिस्टम में करीब ₹3.02 लाख करोड़ का सरप्लस लिक्विडिटी (surplus liquidity) मौजूद है, फिर भी RBI का यह अतिरिक्त कदम यह दर्शाता है कि वह मॉनेटरी पॉलिसी के सही ट्रांसमिशन (transmission) और क्रेडिट ग्रोथ (credit growth) को बनाए रखने पर ज़ोर दे रहा है। रेपो रेट (repo rate) दिसंबर 2025 तक 5.25% पर बना हुआ था।
हालांकि, इस लिक्विडिटी इंजेक्शन्स में कुछ जोखिम भी छिपे हैं। अगर सिस्टम में लिक्विडिटी ज़रूरत से ज़्यादा हो जाती है ('overshoot'), तो यह महंगाई (inflation) को बढ़ा सकती है, जिससे RBI को अपनी पॉलिसी को समय से पहले कसना पड़ सकता है। वैश्विक भू-राजनीतिक जोखिम (geopolitical risks) और संभावित रुपये में गिरावट (currency depreciation) भी RBI को फॉरेक्स मार्केट (forex market) में हस्तक्षेप करने पर मजबूर कर सकती है, जिससे लिक्विडिटी कम हो सकती है।
इसके अलावा, FY27 के लिए सरकार का ₹17.2 लाख करोड़ का बड़ा बॉरोइंग प्रोग्राम (borrowing program) भी एक चुनौती पेश करेगा, जो सिस्टम से लिक्विडिटी को सोख सकता है। यह देखना अहम होगा कि RBI के OMOs इन दबावों को कितना प्रभावी ढंग से संतुलित कर पाते हैं।
कुल मिलाकर, RBI का यह लगातार OMOs का इस्तेमाल वित्तीय स्थिरता (financial stability) बनाए रखने और मॉनेटरी पॉलिसी के सुचारू ट्रांसमिशन (smooth monetary policy transmission) को सुनिश्चित करने के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए, RBI की लिक्विडिटी मैनेजमेंट की भूमिका, खासकर वैश्विक अनिश्चितताओं के दौर में, महत्वपूर्ण बनी रहेगी। भविष्य में RBI के कदम, महंगाई के रुझान, ग्लोबल कैपिटल फ्लो (global capital flows) और रुपये की दिशा पर निर्भर करेंगे।
