RBI का लिक्विडिटी मैनेजमेंट प्लान
RBI का यह ₹1 लाख करोड़ का ऐलान, ओपन मार्केट ऑपरेशंस (OMOs) के ज़रिए, एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। इसका मकसद फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) के अंत में आने वाली लिक्विडिटी की कमी से निपटना और सरकारी उधार की लागत को स्थिर रखना है। यह बड़ी राशि, ₹50,000 करोड़ की दो किश्तों में 9 मार्च और 13 मार्च को जारी की जाएगी, ताकि गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) और एडवांस टैक्स (Advance Tax) के भारी भुगतान से सिस्टम में आने वाले दबाव को पहले ही संभाला जा सके। RBI का यह कदम लिक्विडिटी मैनेजमेंट में उसकी सक्रिय भूमिका को दर्शाता है।
लिक्विडिटी का सुरक्षा कवच
RBI की तरफ से ₹1 लाख करोड़ के ओपन मार्केट ऑपरेशन (OMO) की खरीद, बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी (Liquidity) बढ़ाने का सीधा कदम है। यह इसलिए ज़रूरी है क्योंकि टैक्स पेमेंट की वजह से बड़ी रकम सिस्टम से बाहर जाने की उम्मीद है। 5 मार्च तक, बैंकिंग सिस्टम में ₹3,02,440 करोड़ का सरप्लस (Surplus) था। लेकिन, RBI का आकलन है कि टैक्स के इस भारी फ्लो (Outflow) से यह बफर (Buffer) कम हो सकता है, जिससे सिस्टम घाटे (Deficit) में जा सकता है। सरकारी सिक्योरिटीज खरीदकर, RBI सिस्टम में पैसा डालता है, जिससे बैंकों के रिज़र्व बढ़ते हैं और लिक्विडिटी बढ़ती है। इससे मनी मार्केट (Money Market) का कामकाज सुचारू रहता है।
फाइनेंशियल ईयर के अंत की चुनौतियाँ
RBI के लिए ऐसे OMOs का इस्तेमाल फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) के अंत में एक आम बात है। पिछले सालों में भी, एडवांस टैक्स और GST के भुगतान के कारण बैंकिंग सिस्टम की लिक्विडिटी में कमी आई थी, जिस पर RBI ने वेरिएबल रेट रेपो (Variable Rate Repo) जैसे तरीकों से पैसे डाले थे। मार्च 2025 में भी RBI ने ₹1 ट्रिलियन के OMOs किए थे। RBI का यह लगातार दखल यह बताता है कि वह साल के अंत की तंगी को क्रेडिट फ्लो (Credit Flow) या मार्केट की स्थिरता में बाधा बनने से रोकना चाहता है।
बॉन्ड यील्ड को कंट्रोल करने की कोशिश
सिस्टम में पर्याप्त कैश रखने के अलावा, RBI की OMO खरीद का एक और अहम मकसद सरकारी सिक्योरिटीज (G-Sec) की यील्ड (Yield) को कंट्रोल करना है। लिक्विडिटी की कमी निवेशकों को ज़्यादा रिटर्न की मांग करने पर मजबूर कर सकती है, जिससे यील्ड बढ़ सकती है और सरकार के लिए उधार लेना महंगा हो सकता है। RBI का यह कदम साफ संकेत देता है कि वह G-Sec यील्ड को बढ़ने से रोकना चाहता है, खासकर जब सरकार का उधार कार्यक्रम (Borrowing Program) बड़ा है। अगले फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) के लिए ₹17.2 ट्रिलियन का रिकॉर्ड उधार लेने का प्लान है। ज़्यादा उधार सप्लाई बढ़ा सकता है, जिससे यील्ड पर दबाव आ सकता है।
अंदरूनी कमजोरियां और जोखिम
हालांकि RBI सक्रिय कदम उठा रहा है, लेकिन कुछ कमजोरियां भी हैं। बार-बार लिक्विडिटी की ज़रूरत, खासकर टैक्स भुगतान के लिए, यह दिखाती है कि बैंकिंग सिस्टम का बफर झटकों के लिए कितना तैयार है। मिडिल ईस्ट (Middle East) में जारी टेंशन तेल की कीमतों और ग्लोबल अस्थिरता (Volatility) को बढ़ा रही है, जिससे भारत में महंगाई (Inflation) बढ़ सकती है। मंहगाई बढ़ने और रुपये (Rupee) के कमजोर होने से RBI को मॉनेटरी पॉलिसी (Monetary Policy) सख्त करनी पड़ सकती है या यील्ड मैनेजमेंट में दिक्कत आ सकती है। इसके अलावा, भारत की सरकारी बॉन्ड यील्ड APAC के दूसरे देशों के मुकाबले ज़्यादा है, भले ही डोमेस्टिक महंगाई कम हो। अगले फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) के लिए भारी सरकारी उधार और ग्लोबल अनिश्चितताएं, यील्ड पर दबाव बनाए रख सकती हैं।
आगे का नज़रिया
एक्सपर्ट्स का मानना है कि RBI के इस कदम से अल्पावधि (Short-term) की लिक्विडिटी और बॉन्ड यील्ड स्थिर रहेगी। हालांकि, ग्लोबल टेंशन और बड़े सरकारी उधार कार्यक्रम की वजह से यील्ड नज़दीकी भविष्य (Near-term) में ऊंची रह सकती है। अगर दबाव बढ़ता है तो बाज़ार RBI के और कदमों पर नज़र रखेगा। RBI का लिक्विडिटी इंजेक्शन को महंगाई कंट्रोल और फिस्कल लक्ष्यों के साथ संतुलित करना, नए फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) में मार्केट की स्थिरता के लिए अहम होगा।