RBI का बड़ा दांव: पूर्व गवर्नर सुब्बाराव का सुझाव, रुपये को गिरने दें!

ECONOMY
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AuthorNeha Patil|Published at:
RBI का बड़ा दांव: पूर्व गवर्नर सुब्बाराव का सुझाव, रुपये को गिरने दें!
Overview

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पूर्व गवर्नर दुव्वुरी सुब्बाराव ने देश की मॉनेटरी पॉलिसी में बड़े बदलाव की वकालत की है। उनका कहना है कि RBI को रुपये में और गिरावट को स्वीकार करना चाहिए ताकि इसे एक शॉक एब्जॉर्बर (shock absorber) की तरह इस्तेमाल किया जा सके। वहीं, महंगाई से निपटने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी की बजाय लिक्विडिटी (liquidity) एडजस्टमेंट पर ध्यान देना चाहिए।

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मॉनेटरी पॉलिसी में बदलाव की जरूरत

मौजूदा हालात में, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के लिए रुपये की पारंपरिक तरीके से रक्षा करना उल्टा पड़ सकता है। अगर RBI करेंसी को लेकर 'हाथ पीछे खींचने' की रणनीति अपनाता है, तो वह विदेशी मुद्रा भंडार (forex reserves) बचा सकता है और बाजार को संतुलन खोजने दे सकता है। इस नजरिए के मुताबिक, मौजूदा एक्सटर्नल अकाउंट डेफिसिट (external account deficit) से निपटने के लिए ब्याज दरों में भारी बढ़ोतरी जैसे सख्त उपायों के बजाय करेंसी मार्केट में कीमतों का एडजस्टमेंट ज्यादा बेहतर है। यह तरीका डोमेस्टिक इकोनॉमिक ग्रोथ (domestic economic growth) को भी नुकसान नहीं पहुंचाएगा।

लिक्विडिटी पर फोकस

ब्याज दरों को टारगेट करने की बजाय लिक्विडिटी मैनेजमेंट (liquidity management) पर स्विच करने से RBI को अस्थिर माहौल में सटीक कदम उठाने का मौका मिलता है। सबसे बड़ी चिंता एनर्जी इम्पोर्ट (energy import) की लागत का असर है, जो सीधे तौर पर घरेलू खपत पर टैक्स की तरह है। सीधे लिक्विडिटी की टाइट (tight) करने से RBI सट्टेबाजी वाले कैपिटल आउटफ्लो (capital outflows) को रोक सकता है। इसमें रेपो रेट (repo rate) बढ़ाने का साइड इफेक्ट नहीं होगा, जिससे सरकार और कॉर्पोरेट सेक्टर पर कर्ज चुकाने का बोझ बढ़ सकता है। यह रणनीति कई उभरते बाजारों (emerging markets) में देखी गई है, जिन्होंने डॉलर की मजबूती के दौर में खुद को बचाने के लिए इंटरेस्ट रेट पैरिटी (interest rate parity) बनाए रखी, बिना करेंसी को बचाने के लिए बड़े इंटरवेंशन (interventions) किए।

गिरावट के पीछे के कारण और रिस्क

रुपये को स्थिर न करने के अपने स्ट्रक्चरल रिस्क (structural risks) हैं। लगातार गिरावट महंगाई को और बढ़ा सकती है, क्योंकि इम्पोर्टर्स को जरूरी सामान, खासकर कच्चा तेल (crude oil) और इंडस्ट्रियल गुड्स (industrial goods) के लिए ज्यादा पैसे देने होंगे। अगर RBI इस 'लॉ-फेयर' (laissez-faire) रवैये को अपनाता है, तो 'इम्पोर्टेड इन्फ्लेशन' (imported inflation) का खतरा आम आदमी की महंगाई की उम्मीदों को हमेशा के लिए बिगाड़ सकता है। इसके अलावा, फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (foreign institutional investors) अक्सर करेंसी में लगातार कमजोरी को अपनी होल्डिंग्स (holdings) कम करने का संकेत मानते हैं, जिससे कैपिटल फ्लाइट (capital flight) और और ज्यादा गिरावट का चक्र शुरू हो सकता है। भले ही 'शॉक एब्जॉर्बिंग करेंसी' का सिद्धांत थ्योरी में सही हो, भारत के एनर्जी-इम्पोर्ट पर भारी बिल को देखते हुए, कमजोर रुपया कॉर्पोरेट मार्जिन (corporate margins) को कम करके और प्राइवेट इन्वेस्टमेंट (private investment) को दबाकर ग्रोथ को रोक सकता है।

जून पॉलिसी की राह

बाजार अब जून में होने वाली मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की मीटिंग के लिए अपनी उम्मीदों को फिर से तय कर रहे हैं। चुनौती यह है कि ग्रोथ को बढ़ावा देने की जरूरत और लगातार साइकोलॉजिकल फ्लोर (psychological floor) को छूते रुपये के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। अगर MPC रुपये को सपोर्ट करने के लिए लिक्विडिटी टाइट करने का विकल्प चुनती है, तो इंटरबैंक रेट्स (interbank rates) में बढ़ोतरी से शॉर्ट-टर्म बॉन्ड यील्ड्स (short-term bond yields) पर ऊपर की ओर दबाव पड़ेगा। निवेशकों को ड्यूरेशन रिस्क (duration risk) से सावधान रहना चाहिए, क्योंकि RBI लॉन्ग-टर्म इकोनॉमिक इलास्टिसिटी (economic elasticity) के लिए एक्सचेंज रेट की स्थिरता को कुर्बान करने के लिए तैयार दिख रहा है। यह कदम डोमेस्टिक मॉनेटरी रेजीम (monetary regime) में एक बड़े बदलाव का संकेत देता है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.