स्थिरता पर दबाव
ज़्यादातर एनालिस्ट्स (Analysts) को उम्मीद है कि RBI अपनी आगामी 3-5 जून की मीटिंग में पॉलिसी रेट (Policy Rate) को स्थिर रखेगा। हालांकि, मौजूदा फाइनेंशियल कंडीशंस (Financial Conditions) बता रही हैं कि सेंट्रल बैंक का बॉरोइंग कॉस्ट (Borrowing Cost) पर कंट्रोल कमज़ोर पड़ रहा है। मार्केट पार्टिसिपेंट्स (Market Participants) पहले से ही ज़्यादा ब्याज दरें चुका रहे हैं, कमर्शियल पेपर यील्ड्स (Commercial Paper Yields) ऑफिशियल 5.25% रेपो रेट से काफी ऊपर, करीब 8% पर पहुंच गए हैं। यह बड़ा अंतर मौजूदा इंटरेस्ट रेट पाथ (Interest Rate Path) पर भरोसे की कमी को दर्शाता है। RBI अपनी 6.5% GDP ग्रोथ फोरकास्ट (GDP Growth Forecast) को सपोर्ट करने और रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचे रुपये को संभालने के बीच फंसा हुआ है।
रुपये की कमजोरी से बढ़ी महंगाई
पिछली बार की महंगाई के उलट, मौजूदा प्राइस प्रेशर (Price Pressure) डोमेस्टिक खर्च से ज़्यादा ग्लोबल फैक्टर्स (Global Factors) के कारण है। डॉलर के मुकाबले 95 के स्तर पर पहुंचे रुपये की गिरावट से इंपोर्ट (Import) महंगा हो गया है, खासकर एनर्जी और मैन्युफैक्चरिंग (Manufacturing) के लिए। ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent Crude Oil) की कीमतें $100 प्रति बैरल से ऊपर बने रहने के साथ, बढ़ी हुई इनपुट कॉस्ट (Input Cost) सीधे प्रोड्यूसर प्राइस (Producer Price) को प्रभावित कर रही है। इन बाहरी दबावों के बावजूद ब्याज दरों को बहुत कम रखने से, RBI एक बड़ी करेंसी डीवैल्यूएशन (Currency Devaluation) का जोखिम उठा रहा है, जिससे साल के अंत में कहीं ज़्यादा बड़ी और हानिकारक रेट हाइक्स (Rate Hikes) करनी पड़ सकती हैं।
पॉलिसी बदलाव से मार्केट को खतरा
इंडियन स्टॉक्स (Indian Stocks) के लिए एक बड़ा खतरा यह है कि RBI का अचानक आक्रामक रुख (Hawkish Turn) ज़्यादा कर्ज वाली कंपनियों को चौंका सकता है। इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) और रियल एस्टेट (Real Estate) जैसे सेक्टर्स, जिन पर काफी कर्ज है, विशेष रूप से असुरक्षित हैं, क्योंकि 10-साल के सरकारी बॉन्ड यील्ड्स (Government Bonds Yields) फरवरी के अंत से काफी बढ़ गए हैं। पहले बैंक रेट इंक्रीज (Rate Increase) को मैनेज कर सकते थे, लेकिन अब नेट इंटरेस्ट मार्जिन (Net Interest Margins) सिकुड़ रहे हैं और बैड लोंस (Bad Loans) बढ़ रहे हैं। अगर RBI ग्रोथ के बजाय करेंसी स्टेबिलिटी (Currency Stability) को प्राथमिकता देता है, तो उपलब्ध कैश (Cash) में कमी से वेरिएबल-रेट डेट (Variable-Rate Debt) वाली कंपनियों पर गंभीर असर पड़ सकता है। इस पॉलिसी बदलाव से उन बिज़नेस (Business) के सामने मुश्किल खड़ी हो सकती है जिन्होंने कम ब्याज दरों के दौर में बिना बैलेंस शीट मजबूत किए भारी कर्ज लिया था, जिससे कॉर्पोरेट इनसॉल्वेंसी (Corporate Insolvency) की एक लहर आ सकती है, जिसे बाज़ार ने अभी पूरी तरह से प्राइस इन (Price In) नहीं किया है।
आगे क्या होगा दरों के साथ?
मार्केट का ध्यान अब इस बात पर नहीं है कि RBI दरें बढ़ाएगा या नहीं, बल्कि इस बात पर है कि यह बदलाव कब होगा। डेरिवेटिव मार्केट (Derivatives Market) के इंडिकेटर्स (Indicators) बताते हैं कि ट्रेडर्स (Traders) पहले से ही RBI की क्रेडिबिलिटी (Credibility) बढ़ाने के लिए 50-बेसिस-पॉइंट (Basis Point) रेट इंक्रीज की उम्मीद कर रहे हैं। आगामी पॉलिसी स्टेटमेंट (Policy Statement) में रुपये पर RBI की कमेंट्री (Commentary) और रेपो रेट (Repo Rate) के फैसले के बजाय, प्राइस स्टेबिलिटी (Price Stability) को इकोनॉमिक ग्रोथ (Economic Growth) पर तरजीह देने की कमेटी की इच्छा पर बारीकी से नजर रखी जाएगी।
