भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने एक अहम कदम उठाते हुए ₹10 और ₹20 के पॉलीमर नोटों को पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर लॉन्च किया है। इसका मकसद इन नोटों की मजबूती और लागत-प्रभावशीलता का परीक्षण करना है।
क्यों चुने गए ₹10 और ₹20 के नोट?
RBI ने यह पहल यह परखने के लिए की है कि पॉलीमर नोट कागज के नोटों की तुलना में कितने ज़्यादा टिकाऊ होते हैं। ये नोट नमी, गंदगी और घिसाव के प्रति ज़्यादा मज़बूती दिखाएंगे, जिससे इनकी लाइफस्टाइल बढ़ेगी।
यह कोई पहली बार नहीं है जब RBI पॉलीमर करेंसी पर विचार कर रहा है। इससे पहले 2009 में भी ऐसे नोट लॉन्च करने की कोशिश की गई थी, लेकिन तब कुछ तकनीकी दिक्कतें आईं थीं, जिसके बाद यह प्लान रोक दिया गया था।
ATM नेटवर्क पर कम असर
RBI ने यह पायलट प्रोजेक्ट केवल ₹10 और ₹20 के नोटों तक सीमित रखा है। इसकी एक खास वजह यह है कि ये नोट सर्कुलेशन में भले ही ज़्यादा हों, लेकिन अर्थव्यवस्था में इनकी कुल वैल्यू काफी कम है। इससे RBI को बिना बड़े फाइनेंशियल रिस्क के जनता की प्रतिक्रिया और नोटों के इस्तेमाल को समझने में मदद मिलेगी।
साथ ही, बड़े नोट जैसे ₹200 या ₹500 को ATM से ज़्यादा निकाला जाता है। अगर पॉलीमर नोटों को इनमें इस्तेमाल किया जाता, तो सभी ATMs को कैलिब्रेट करने में काफी खर्चा और समय लगता। ₹10 और ₹20 के नोट ज़्यादातर बैंक काउंटरों से बांटे जाते हैं, जिससे ATM नेटवर्क में किसी बड़े बदलाव की ज़रूरत नहीं पड़ेगी और कैश निकालने में कोई रुकावट नहीं आएगी।
लागत में कमी का लक्ष्य
इस पूरी कवायद का एक बड़ा मकसद करेंसी मैनेजमेंट की कुल लागत को कम करना है। कागज के नोट जल्दी खराब हो जाते हैं और उन्हें बार-बार बदलना पड़ता है, जिसमें छपाई का भारी खर्च आता है। अगर पॉलीमर नोट ज़्यादा समय तक चलते हैं, तो RBI को इन्हें बदलने की ज़रूरत कम पड़ेगी, जिससे लागत में बचत होगी।
फिलहाल, यह प्रोजेक्ट टेस्टिंग फेज में है और पुराने कागज़ के नोटों को बंद करने की कोई योजना नहीं है। निवेशक और बाज़ार पर नज़र रखने वाले लोग RBI की भविष्य की रिपोर्ट पर ध्यान देंगे कि यह नई करेंसी कितनी कारगर साबित होती है।
