RBI की 'ठहरी' चाल: ब्याज दरें 5.25% पर बरकरार
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) ने अपनी प्रमुख ब्याज दर, यानी रेपो रेट को 5.25% पर बरकरार रखा है। RBI ने यह 'देखो और इंतजार करो' वाली रणनीति अपनाई है, ताकि मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों का बेहतर आकलन किया जा सके।
रुपया गिरा, चिंता बढ़ी
हाल के दिनों में भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले काफी कमजोर हुआ है, जो 92.4250 के करीब कारोबार कर रहा है। पिछले एक साल में इसमें करीब 7.25% की गिरावट आई है। इस कमजोरी की मुख्य वजह मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव है, जिसका असर कच्चे तेल की कीमतों और विदेशी निवेश पर पड़ रहा है। वहीं, 7.03% के आसपास चल रहा 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड (Indian government bond yield) भी महंगाई को लेकर चिंता और वैश्विक निवेशकों की सतर्कता को दर्शाता है। Morgan Stanley का अनुमान है कि इन बाहरी दबावों के चलते भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) जीडीपी का 2.5% तक पहुंच सकता है।
RBI का Forex Market में दखल
इस स्थिति से निपटने के लिए RBI विदेशी मुद्रा बाजार (forex market) में लगातार दखल दे रहा है। फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स में RBI की नेट डॉलर पोजीशन फरवरी 2026 के अंत तक रिकॉर्ड 77.25 अरब डॉलर तक पहुंच गई, जो रुपये को गिरने से रोकने के उसके प्रयासों को दिखाता है, बिना विदेशी मुद्रा भंडार को ज्यादा कम किए।
'एल नीनो' का खतरा और महंगाई की चिंता
केंद्रीय बैंक ने 'एल नीनो' की बढ़ती संभावनाओं पर भी चिंता जताई है। मौसम की यह स्थिति अक्सर भारत में सूखे का कारण बनती है, जो आगामी खरीफ फसलों और कृषि उत्पादन के लिए एक बड़ा खतरा है। विश्लेषकों का अनुमान है कि इस साल सूखे की 30% संभावना है, जिससे फसल की पैदावार, खाद्य सुरक्षा और महंगाई पर असर पड़ सकता है। हालांकि, फरवरी 2026 में भारत की महंगाई दर 3.21% थी, जो RBI के 2-6% के लक्ष्य बैंड में है, लेकिन 'एल नीनो' के कारण खाद्य कीमतों में संभावित वृद्धि से अनिश्चितता बढ़ गई है।
आर्थिक संतुलन की चुनौती
RBI एक क्लासिक आर्थिक दुविधा का सामना कर रहा है: एक स्वतंत्र मौद्रिक नीति, खुले पूंजी प्रवाह और स्थिर विनिमय दर के बीच संतुलन बनाना। खासकर वैश्विक संघर्षों और प्रमुख शिपिंग मार्गों में बाधाओं ने इस चुनौती को और बढ़ा दिया है। लगातार कमजोर होता रुपया, अगर अनियंत्रित रहा, तो इंपोर्टेड महंगाई को बढ़ा सकता है और ट्रेड डेफिसिट को खराब कर सकता है। RBI ने बैंकों की ओपन पोजीशन को कैप करने जैसे कदम उठाए हैं, लेकिन ये दबाव को केवल अस्थायी रूप से रोक सकते हैं। फॉरवर्ड मार्केट में RBI का दखल इतना बड़ा है कि कुछ रिपोर्टों के अनुसार, इसकी नेट शॉर्ट डॉलर पोजीशन 100 अरब डॉलर से भी अधिक हो सकती है, जो पारंपरिक मुद्रा प्रबंधन की सीमाओं को उजागर करता है।
आगे का रास्ता
वित्त वर्ष 2027 के लिए भारत की आर्थिक ग्रोथ का अनुमान RBI ने 6.9% लगाया है, हालांकि Morgan Stanley को यह 6.2% रहने की उम्मीद है। महंगाई का अनुमान RBI ने 4.6% रखा है, लेकिन अगर कमोडिटी की कीमतें ऊंची बनी रहीं या 'एल नीनो' की स्थिति बिगड़ी तो अर्थशास्त्री इसे 5.2% या उससे भी अधिक पहुंचने की आशंका जता रहे हैं। अब बाजार RBI की वास्तविक मुद्रा हस्तक्षेप रणनीतियों और 'एल नीनो' के प्रभाव के आकलन पर करीब से नजर रखेगा। RBI के महंगाई संबंधी दृष्टिकोण और बाहरी विश्लेषकों के अधिक सतर्क विचारों के बीच का अंतर, महंगाई में आश्चर्यजनक वृद्धि के निरंतर जोखिम को दर्शाता है। यदि रुपये पर लगातार दबाव बना रहा या महंगाई लक्ष्यों को पार कर गई, तो RBI को एक अधिक आक्रामक रुख अपनाना पड़ सकता है, जिसका असर FY27 के लिए अनुमानित आर्थिक विकास पर पड़ सकता है।