RBI ने 'फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट (बरोइंग एंड लेंडिंग) (फर्स्ट अमेंडमेंट) रेगुलेशन्स, 2026' के तहत ECB फ्रेमवर्क में ये बड़े बदलाव किए हैं। यह कदम कंपनियों के लिए अंतरराष्ट्रीय पूंजी (capital) तक पहुँच को आसान बनाने के लिए उठाया गया है।
योग्यता का विस्तार और बढ़ी हुई सीमा
इस बदलाव का सबसे अहम हिस्सा है योग्यता का विस्तार। अब कोई भी गैर-व्यक्तिगत निवासी इकाई (non-individual resident entity) जो किसी केंद्रीय या राज्य कानून के तहत पंजीकृत है, विदेश से कर्ज ले सकती है। इसमें वे कंपनियाँ भी शामिल हैं जो पुनर्गठन (restructuring) या दिवालियापन (insolvency) की प्रक्रिया में हैं। साथ ही, RBI द्वारा रेगुलेटेड संस्थाओं की विदेशी शाखाएं और इंटरनेशनल फाइनेंशियल सर्विसेज सेंटर्स (IFSC) में मौजूद वित्तीय संस्थान भी अब कर्ज दे सकेंगे। बरोइंग की सालाना लिमिट को बढ़ाकर 1 अरब डॉलर या कंपनी की नेट वर्थ का 300% कर दिया गया है, जो पहले 750 मिलियन डॉलर थी।
बाजार आधारित कीमत और एक समान अवधि
सबसे बड़ी राहत यह है कि कर्ज की 'ऑल-इन-कॉस्ट' (all-in-cost) की ऊपरी सीमा हटा दी गई है। इसका मतलब है कि अब बरोइंग की कीमत बाजार की मौजूदा परिस्थितियों के हिसाब से तय होगी। हाँ, छोटी अवधि के लोन के लिए कुछ खास नियम लागू होंगे। अब लोन की मिनिमम एवरेज मैच्योरिटी पीरियड (MAMP) को स्टैंडर्ड तौर पर 3 साल कर दिया गया है।
एंड-यूज़ (End-Use) नियमों में नरमी
नए नियमों के तहत, ECB के पैसों का इस्तेमाल जमीन और अचल संपत्ति (immovable property) खरीदने के लिए भी किया जा सकता है, बशर्ते यह फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) के तहत अनुमत क्षेत्रों से जुड़ा हो और 'कंट्रोल' (control) का अधिग्रहण हो। मौजूदा कर्जों को रिफाइनेंस (refinance) करने की भी इजाजत मिल गई है।
किन सेक्टर्स को मिलेगा फायदा?
यह उदारीकरण भारत के आर्थिक लक्ष्यों के साथ तालमेल बिठाता है। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को इससे काफी फायदा होने की उम्मीद है, क्योंकि अब इंडस्ट्रियल पार्क और मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए ECB फंड मिल सकेगा। इसी तरह, कृषि क्षेत्र के कुछ हिस्सों, जैसे नियंत्रित-वातावरण वाली खेती (controlled-environment cultivation) और पशुपालन (animal husbandry) के लिए भी विदेशी उधारी का रास्ता खोला गया है। रियल एस्टेट सेक्टर के लिए यह एक बड़ा कदम है, डेवलपर्स अब FDI-अनुमत प्रोजेक्ट्स के लिए विदेशी कर्ज का फायदा उठा सकेंगे, जिससे फंडिंग की लागत कम हो सकती है।
बढ़ते एक्सटर्नल डेट का जोखिम
हालांकि, विदेशी कर्ज लेने में आसानी के साथ ज्यादा जोखिम भी जुड़े हैं। सबसे बड़ी चिंता भारत के कुल एक्सटर्नल डेट (external debt) के बढ़ने की है, जो ज्यादातर विदेशी मुद्राओं में है। इससे अर्थव्यवस्था वैश्विक झटकों (global shocks) और करेंसी की अस्थिरता (currency fluctuations) के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो सकती है। इसलिए, कंपनियों को मजबूत हेजिंग (hedging) और रिस्क मैनेजमेंट की रणनीति बनानी होगी। RBI ने चिट फंड, निधि कंपनियों और कुछ कैपिटल मार्केट निवेशों जैसे इस्तेमाल पर प्रतिबंध बनाए रखे हैं।
आगे की राह
कुल मिलाकर, ये नए ECB नियम भारतीय बाजारों को वैश्विक वित्त के साथ बेहतर ढंग से एकीकृत (integrate) करने का लक्ष्य रखते हैं। विश्लेषकों का मानना है कि इससे कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मकता (competitiveness) बढ़ेगी और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर व मैन्युफैक्चरिंग प्रोजेक्ट्स के लिए फंडिंग में तेजी आएगी। हालांकि, कंपनियों को इन नए रास्तों का फायदा उठाते हुए करेंसी और कर्ज प्रबंधन के जोखिमों को सावधानी से संभालना होगा।