RBI की रणनीति: दर को नहीं, उतार-चढ़ाव को संभालना
हाल ही में भारतीय रुपये में आई गिरावट, जो पिछले एक महीने में सबसे बड़ी है, सीधे तौर पर ग्लोबल क्रूड ऑयल की ऊंची कीमतों का नतीजा है। डॉलर के मुकाबले रुपया 94.80 तक गिर गया था। हालांकि, सरकारी बैंकों द्वारा की गई डॉलर की बिकवाली, जिसे RBI का दखल माना जा रहा है, ने कुछ हद तक नुकसान को कम किया और रुपया 94.73 के करीब बंद हुआ। यह RBI का एक खास तरीका दिखाता है: वे किसी खास एक्सचेंज रेट को डिफेंड करने के बजाय, रुपये में अत्यधिक और disruptive उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करना चाहते हैं। यह केंद्रीय बैंक की उस पुरानी प्रतिबद्धता के अनुरूप है, जो मार्केट-डिटरमाइंड करेंसी को बढ़ावा देती है, ताकि बाज़ार में अनियंत्रित हलचल और 'सेल्फ-फुलफिलिंग एक्सपेक्टेशन्स' से बचा जा सके।
कच्चे तेल का डबल अटैक: अर्थव्यवस्था पर बोझ और महंगाई का खतरा
भारत अपनी जरूरत का करीब 85-88% कच्चा तेल इंपोर्ट करता है। ऐसे में, ग्लोबल एनर्जी की कीमतों में उछाल सीधे तौर पर भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। ब्रेंट क्रूड का दाम $110 प्रति बैरल के ऊपर बना हुआ है, जिससे देश का इंपोर्ट बिल काफी बढ़ गया है। एनालिस्ट्स का अनुमान है कि अगर क्रूड ऑयल की कीमत $10 बढ़ती है, तो भारत के सालाना तेल इंपोर्ट बिल में $13-14 बिलियन का इजाफा हो सकता है। इससे करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) 0.35% से 0.5% तक बढ़ सकता है। इसका असर महंगाई पर भी पड़ेगा; अगर ऑयल की कीमतों में 10% की बढ़ोतरी होती है, तो होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) में 0.7% से 1% का इजाफा हो सकता है। मध्य-पूर्व में जारी जियोपॉलिटिकल टेंशन की वजह से सप्लाई में रुकावट का डर बना हुआ है। मूडीज एनालिटिक्स के मुताबिक, अगर यह स्थिति लंबी खिंचती है, तो भारत की GDP अपने अनुमानित रास्ते से 4% तक गिर सकती है।
वैश्विक संकेत और अमेरिकी फेड की चाल
दुनिया भर की तेल-संवेदनशील एशियाई करंसीज़, जैसे इंडोनेशियाई रुपिया (Indonesian Rupiah), पर भी दबाव बढ़ा है। वहीं, मार्केट पार्टिसिपेंट्स अमेरिकी फेडरल रिजर्व (US Federal Reserve) की अगली पॉलिसी मीटिंग का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। ज्यादातर इकोनॉमिस्ट्स का मानना है कि फेड ब्याज दरों को 3.5% से 3.75% की रेंज में ही रखेगा। लेकिन, ऊर्जा कीमतों का अमेरिकी अर्थव्यवस्था और वैश्विक परिदृश्य पर पड़ने वाले असर को लेकर फेड का कमेंट्री काफी अहम होगी। जे.पी. मॉर्गन (J.P. Morgan) का मानना है कि फेड 'वेट-एंड-सी' (wait-and-see) यानी इंतजार करो और देखो वाली रणनीति अपनाएगा और इन झटकों के बीच धैर्य रखेगा। ब्याज दरों में कटौती का विचार शायद 2027 की तीसरी तिमाही में ही किया जा सकता है।
मंदी का अंदेशा: स्ट्रक्चरल कमजोरी और सीमित गुंजाइश
लगातार तेल इंपोर्ट पर निर्भरता भारत के लिए एक स्ट्रक्चरल कमजोरी पैदा करती है। तेल की कीमतों में मौजूदा उछाल और भू-राजनीतिक जोखिम, रुपये पर दबाव बना रहे हैं। पिछले फाइनेंशियल ईयर में, मजबूत मैक्रोइकॉनॉमिक फंडामेंटल्स के बावजूद, रुपया औसत से ज़्यादा गिरा है। RBI का इंटरवेंशन स्ट्रैटेजी, जो शॉर्ट-टर्म वॉलिटी को कंट्रोल करने में कारगर है, लंबे समय तक बाहरी झटकों के सामने सीमित साबित हो सकती है। करीब $650 बिलियन से ज़्यादा का फॉरेक्स रिजर्व (Foreign Exchange Reserves) एक अहम बफर (buffer) है, लेकिन अगर तेल की ऊंची कीमतें लंबे समय तक बनी रहीं, तो सरकारी खजाने पर दबाव बढ़ सकता है और ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit) और चौड़ा हो सकता है, जिससे इम्पोर्टेड इन्फ्लेशन (imported inflation) बढ़ सकता है। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि RBI मनोवैज्ञानिक रूप से अहम माने जाने वाले राउंड नंबर्स (जैसे 95) को तोड़ने से भी रोक रहा है, ताकि स्पेकुलेटिव रश (speculative rush) को रोका जा सके। ऐतिहासिक तौर पर, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के साथ ही रुपये में गिरावट और बाज़ार में कमजोरी देखी गई है। मौजूदा हालात, जहां एनर्जी की ऊंची लागत और वैश्विक अनिश्चितता है, RBI की मॉनेटरी ईजिंग (monetary easing) यानी ब्याज दरें घटाने की गुंजाइश को सीमित कर सकते हैं, जो ग्रोथ पर भी असर डाल सकता है।
आगे का रास्ता: अनिश्चितता के बीच संतुलन
भविष्य में, रुपये की चाल सीधे तौर पर कच्चे तेल की कीमतों के अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक घटनाओं पर निर्भर करेगी। RBI की सक्रिय वॉलिटी मैनेजमेंट रणनीति स्थिरता लाने की कोशिश कर रही है, लेकिन बाहरी दबाव बना रहेगा। एनालिस्ट्स का अनुमान है कि ऊंचे तेल दाम, वैश्विक जोखिम और मजबूत अमेरिकी डॉलर घरेलू फंडामेंटल्स पर हावी रहेंगे, जिससे रुपये में मामूली गिरावट का रुझान (depreciation bias) जारी रह सकता है। अब सबकी निगाहें इस बात पर होंगी कि RBI अपनी इंटरवेंशन स्ट्रैटेजी और मार्केट-डिटरमाइंड एक्सचेंज रेट्स को कैसे संतुलित करता है, और अमेरिकी फेडरल रिजर्व की आगे की राह ग्लोबल कैपिटल फ्लो और उभरते बाज़ारों की करंसीज़ को कैसे प्रभावित करती है।
