RBI पर महंगाई का दबाव: क्या बढ़ेंगी ब्याज दरें?
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के लिए आने वाला समय काफी चुनौतीपूर्ण रहने वाला है। बाहरी वजहों जैसे ऊर्जा की बढ़ती कीमतें और अल नीनो के संभावित असर के चलते महंगाई बढ़ रही है, जबकि देश की आर्थिक विकास दर (GDP Growth) का अनुमान भी घटा दिया गया है। ऐसे में RBI पर यह बड़ा सवाल है कि वह महंगाई पर काबू कैसे पाए और साथ ही अर्थव्यवस्था को भी संभाले।
HSBC की रिपोर्ट और ब्याज दरें
HSBC की रिपोर्ट के मुताबिक, RBI वित्त वर्ष 2027 में दो बार 25 बेसिस पॉइंट की दर से ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर सकता है। इससे रेपो रेट मौजूदा 5.50% से बढ़कर 5.75% तक पहुंच सकता है। रिपोर्ट में यह भी अनुमान लगाया गया है कि कच्चे तेल के दाम बढ़ने और अल नीनो के कारण खाद्य पदार्थों की कीमतों में 0.5 फीसदी की बढ़ोतरी के चलते इस वित्त वर्ष में हेडलाइन इन्फ्लेशन औसतन 5.6% रह सकता है। यह स्थिति अमेरिका के फेडरल रिजर्व और यूरोपीय सेंट्रल बैंक जैसी संस्थाओं के उलट है, जो ब्याज दरें स्थिर रखने या घटाने की सोच रहे हैं। भारतीय रुपये की कीमत फिलहाल अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 83.00-83.50 के आसपास स्थिर है, लेकिन ब्याज दरों का अंतर बढ़ने पर इसमें कमजोरी आ सकती है।
महंगाई के कारण और ग्रोथ में गिरावट
वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें $85 प्रति बैरल के करीब हैं, जो महंगाई बढ़ाने का एक बड़ा कारण है। वहीं, 2026 की तीसरी तिमाही (Q3 2026) तक अल नीनो के विकसित होने की 60% संभावना है, जिससे मॉनसून प्रभावित हो सकता है और कृषि उत्पादन पर असर पड़ सकता है। यह महंगाई का दबाव ऐसे समय में आया है जब भारत की आर्थिक विकास दर का अनुमान घटा दिया गया है। HSBC ने अब FY27 के लिए GDP ग्रोथ का अनुमान घटाकर 6% कर दिया है, जो पहले 7.4% था। अन्य संस्थाएं भी विकास दर 5.8% से 6.2% के बीच रहने का अनुमान लगा रही हैं, जो अर्थव्यवस्था में सुस्ती का संकेत देता है।
ग्रोथ पर जोखिम और आम आदमी
एक बड़ा जोखिम यह है कि नीतिगत गलतियों से 'स्टैगफ्लेशन' (Stagflation) यानी महंगाई और धीमी ग्रोथ का बुरा कॉम्बिनेशन पैदा हो सकता है। ब्याज दरें बढ़ाने का मकसद महंगाई रोकना है, लेकिन यह पहले से कमजोर हो रही अर्थव्यवस्था को और धीमा कर सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अनौपचारिक क्षेत्र, जैसे ग्रामीण परिवार और छोटे व्यवसाय, इन झटकों के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील हैं। ऊंची ब्याज दरें और महंगाई से बेरोजगारी बढ़ सकती है और लोगों की खर्च करने की क्षमता कम हो सकती है, जो भारत की आर्थिक विकास की रफ्तार को धीमा कर देगा।
नीति निर्माताओं के सामने मुश्किल फैसले
HSBC के विश्लेषण से पता चलता है कि वित्त वर्ष 2027 भारतीय नीति निर्माताओं के लिए आसान नहीं होगा। उन्हें महंगाई पर नियंत्रण और आर्थिक विकास को सहारा देने की जरूरत के बीच एक नाजुक संतुलन बनाना होगा। हालांकि, मौजूदा खाद्य भंडार कुछ हद तक सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं, लेकिन ऊर्जा की लगातार बढ़ती कीमतें और जलवायु परिवर्तन की अनिश्चितताओं पर लगातार नजर रखनी होगी। RBI के भविष्य के बयान यह संकेत देंगे कि वे मौद्रिक नीति में कितनी तेजी और किस हद तक बदलाव करते हैं, ताकि वे कीमत स्थिरता बनाए रखने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था की रिकवरी को नुकसान न पहुंचाएं।
